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बचपन बचपन ( लघुकथा ) - मीरा जैन

दिव्यांम के जन्मदिन पर गिफ्ट में आए ढेर से  नई तकनीक के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों में कुछ को  दिव्यम चला नहीं पा रहा था घर के अन्य सदस्यों ने भी हाथ आजमाइश की लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली तभी कामवाली बाई सन्नो का 11 वर्षीय लड़का किसी काम से घर आया सभी को खिलौनों में बेवजह मेहनत करता देख वह बड़े ही धीमे में व संकोची लहजे में बोला -
'आंटी जी ! आप कहें तो मैं इन  खिलौनों को चला कर बता दूं' पहले तो मालती  उसका चेहरा देखती रही फिर मन ही मन सोच रही थी कि इसे दिया तो निश्चित ही तोड़ देगा फिर भी सन्नो का लिहाज कर बेमन से हां कर दी और देखते ही देखते मुश्किल खिलौनों को उसने एक बार में ही स्टार्ट कर दिया सभी आश्चर्यचकित थे , मालती ने सन्नो को हंसते हुए ताना मारा -
' वाह री सन्नो ! तू तो हमेशा कहती है पगार कम पड़ती है और इतने महंगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे '
 इतना ही सुनते ही सन्नों की आंखें नम हो गई उसने भरे गले से कहा- ' मैडम जी ! यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।'

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।

पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
 उज्जैन ,मध्य प्रदेश 
पिन-456010
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

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अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

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आज्ञा की अवहेलना ( लघुकथा ) - मीरा जैन

जैसे ही जलज ने घर मे कदम रखा बुजुर्ग पिता ने बिना किसी लाग लपेट केअपने मन की बात कही या यूँ कहे आदेश दिया -
' बेटा !  मोहल्ले के कम्युनिटी हाल मे वास्तु के सामानों की शानदार प्रदर्शनी लगी है घर मे सुख- शांति, समृद्धि व खुशहाली आदि के लिए ढेर सारी वस्तुएं हैं आस पास के सभी महिला-पुरुष
आवश्यकतानुसार
 वस्तु ले लेकर आ रहे हैं बहू के साथ जाकर चार छ: वस्तुएं ले आ नहीं तो सारी अच्छी अच्छी वस्तुएं बिक जायेंगी '
जलज पिता की बातों से बेपरवाह सोफे पर पसर गया . अपने आदेश कीअवहेलना से खफा मोहन जी भी नाराज से अपने कमरे मे चले गई.
कुछ देर पश्चात जलज कमरे मे पहुँच पिता से मनुहार के अंदाज मे बोला -
' चलो पापा ! चाय बन गई है '
नाराजगी भरे स्वर मे मोहन जी ने जवाब दिया-
' अभी नहीं पीनी है मुझे चाय '
जलज ने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों मे लेकर चूमते हुए कहा-
' जिसके पास पिता हो उसे किसी भी वास्तु की आवश्यकता नहीं होती
है  मेरे प्यारे पापा '
इतना सुन मोहन जी  भी भाव विभोर अपने बेटे को अपलक निहारने लगे बेटे द्वारा की गई आज्ञा की अवहेलना से मोहन जी की आँखें खुशी से नम हो गई थी।

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
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उपवास ( लघुकथा ) - मीरा जैन

समीर ने घर मे कदम रखते ही सामने अक्षय को देख प्रश्न किया-
' क्या बात है बेटा ! आज तुम खेलने नहीं गये तबियत तो ठीक है ?'
उत्साहित स्वर मे अक्षय ने जवाब दिया-
' पापा ! आज मम्मी  के साथ मैने भी निराहार उपवास किया है अब
उनके साथ पूजा भी करूंगा '
' क्या--- ' अवाक समीर का उत्तेजित स्वर उभरा-
' नीना ! ये क्या तमाशा है अक्षय से भी उपवास करवा लिया इस धर्म कर्म
को अपने तक ही सीमित रखो बच्चों के पीछे नहीं पड़ो समझी  '
नीना ने सफाई पेश की-
' समीर ! अब अक्षय कोई छोटा बच्चा नहीं पूरे चौदह वर्ष का हो चुका
 है और उसने स्वेच्छा से उपवास किया है और इसमे बुराई क्या है तन
 और मन के साथ
श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी समाहित है '
समीर ने खीझते हुए पूछा-
' अब तक मैने सुना था उपवास से तन स्वस्थ व आत्मा पवित्र होती है ये
समाज बीच कहाँ से आ गया ?'
नीना ने गंभीरता पूर्वक धीमे से कहा-
' समीर ! बात दरअसल ये है मै चाहती हूँ अक्षय को ये भी ज्ञात हो कि
 भूख क्या होती है भूख का महत्व उसे मालूम होना ही चाहिये
 ताकि बड़ा होकर दीन- हीन , निर्धन व्यक्तियों के प्रति
इसके मन मे सहिष्णुता एवं उदारता के भाव हो भूखों को भोजन कराने
की लालसा इसके मन मे जागृत रहे कुछ नहीं तो किसी जरूरतमंद को हेय दृष्टि से तो नहीं देखेगा ये भी संस्कारों की अनमोल कड़ी है जो स्वस्थ समाज के लिये अति आवश्यक है '
उपवास के इस नये रूप ने समाज सेवी समीर को भाव विभोर कर दिया।

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


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चाह ( लघुकथा ) - मीरा जैन

 स्वाति को देखते ही गोमती का पारा सातवें आसमान में पहुंच गया
' देखो-देखो , इस महारानी को  बड़ी शान से चली आ रही है आज साल भर का इतना बड़ा दिन है,  लक्ष्मी पूजन का महत्त्व ही नहीं है इसके लिये, अरे ! रीति-रिवाज , धर्म-संस्कृति भी कोई चीज होती है केवल पैसे के पीछे भागने से कुछ नहीं होगा समझी, एक दिन नहीं जाती तो कौन सा तूफान आ जाता----.'
मां का गुस्सा देख संदीप भी सहम  गया स्वाति भी चुपचाप अपने कमरे में चली गई.  मां के सामने संदीप की हिम्मत नहीं हो रही थी कि स्वाति को खाने की टेबल पर बुला ले, तभी दरवाजा खुला और स्वाति हाथ मुंह धो, कपड़े बदल कर खाने की टेबल पर आ खाना खाने लगी लेकिन उसकी आंखों में आंसू देख संदीप ने कहा-
' रो क्यों रही हो , मां का गुस्सा भी वाजिब है कम से कम आज के दिन तो तुम्हे घर पर ही रहना चाहिए था '
जवाब मे स्वाति बोली-
'  संदीप ! ये खुशी के आंसू है , मां ने क्या-क्या कहा मुझे कुछ ध्यान नहीं है , मैं तो उस क्षण से अब तक अभिभूत हूं जब गायत्री के परिजनों ने मेरे पैर पकड़ कहा-
' आप साक्षात देवी की अवतार हैं आपने जच्चा और बच्चा दोनों को बचा लिया हम लोगों ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी दीपावली में हमारे घर भी लक्ष्मी आई है हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह भी आपकी तरह नेक दिल और सेवाभावी बने '
 और मालूम संदीप ! आज मैने  उनसे  ऑपरेशन की फीस भी नहीं ली'
 स्वाति की बात सुन रही सासु मां का दिल भर आया सोचने लगी-
 ' मैं अपनी बहू सी कब बनूंगी '

- मीरा जैन

उज्जैन म०प्र०


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सिनेमा, वास्तविकता, प्रतिनिधित्व और समय रूपी संसाधन ( पुनर्विचार )- सौम्या गुप्ता

आज से कुछ साल पहले जब मैं कोई सीरियल या कोई फिल्म देखती थी तब मुझे वहां की स्वच्छता, वहां बड़े- बड़े घर, और बहुत सारी चीजें देख कर यह मन करता था कि काश यह सारी चीजें मेरे पास भी होती। इसीलिए मैं अपने घर को वैसा रखने की कोशिश करती थी लेकिन एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार और एक उच्च वर्ग के बीच समानता लाने की सोच भी जैसे एक बेवकूफी भरी सोच ही थी, लेकिन तब यह समझ नहीं थी कि चीजें सच में कैसी होती हैं? बस मैं यह सारी चीजें करना चाहती थी लेकिन जब मैं बड़ी हुई और चीजों को समझा और देखा की फिल्म की शूटिंग कैसे होती है तो मैंने देखा कि वहां पर जहां बड़ा घर होता था, वहां कुछ सेटअप ही था। 

अब मैं सोचती हूं तो हँसी आती है कि मैं कितने बेवकूफी भरे सपने संजो रही थी। यहां मैंने यह इसलिए बताया है कि आप जब फिल्मों को या सीरियल्स को देखें तो इस बात का ध्यान रखें कि उसमें सच्चाई हो सकती है लेकिन पूरी फिल्म सच्ची हो जरूरी नहीं, नाटकीय रुपांतरण और असली हालात को पर्दे पर लाने की सीमित क्षमता, जैसे पहलू भी ध्यान रखें और नकल करने की कोशिश न करें, जरूरत नहीं, अपने विवेक से काम लें और इस बात को ध्यान रखें कि इंसान उन‌ चीज़ों के लिए ही परेशान रहता है जिसकी उसे सबसे कम जरूरत है।

लोग सिनेमा से कितना ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं? इसके बारे में कुछ कहना चाहती हूं जब हिटलर जर्मनी में शासक बना, उस समय वहाँ जो लोग कभी एक चींटी तक नहीं मार पाते थे, वह लोग‌ इंसान तक को मार देने लगे थे, ऐसा वहां यहूदियों के प्रति फैलाई गई घृणा के कारण हुआ था।

लेकिन अब जर्मनी में जो नरसंहार हुआ था उसके चिन्ह रखे हुए हैं, लोग वहां पर जाते है तथा अपने पूर्वजों की गलतियों पर दुःख प्रकट करते हैं।आज जर्मनी एक विकसित राष्ट्र है।

प्रेम के उथले स्वरूप को भी कुछ गैर जिम्मेदाराना फिल्मों के चलते ही तवज्जो मिली और अनगिनत युवा डिप्रेशन की गर्त में चले गए।

आप भी सिनेमा, सीरिअल और न्यूज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आप अगर यह समझना चाहते है कि कानून और राजनीति कैसे हमारे सिनेमा या सीरिअल को प्रभावित करते है तो आप महिलाओं के लिए बनने वाले कानून और उनके समानांतर बनने वाले सीरिअल या फिल्म देखे, पहले महिलाओं को सिर्फ घर तक सीमित दिखाया गया है, फिर नर्स या टीचर के रूप में, फिर पुलिस या वकील के रूप में और अब आज के समय में महिलाओं पर भी हर तरह के रोल फ़िल्माये जाते है।

इसी तरह हमारे समाज में जिस विचारधारा की प्रबलता होती है, वो चाहे धार्मिक, सामाजिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक उनकी छाप सिनेमा और सीरियल पर पड़ती ही है।

आप जब इन्हें देखे तो पूरा सच न माने, सच इसके आगे और इससे ज्यादा भी हो सकता है और अक्सर होता ही है। आज आपके पास इन्टरनेट है, आप जो देख रहे है, उसके विपरीत या उसकी समीक्षा भी देखिये या आप खुद उन चीजों पर विचार कर ले। 

शुभकामनाएं 

सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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शुभकामनाएं 

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कार्य का सम्मान, उत्कृष्टता और नवाचार ( पुनर्विचार ) - सौम्या गुप्ता

मैं अक्सर सोचती हूँ कि कुछ लोग बिना काम किए ही कैसे सम्मान पा सकते हैं? लोगों के पास खूब पैसा होता है सिर्फ इसलिए!, भले ही वह काम के मामले में बहुत कम ही काम क्यों न करें।

 ऐसा क्यों होता है? शायद ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकतर लोगों की सोंच अब सामंतवादी हो चुकी है, कि जो काम नहीं करता है वही एक अच्छा जीवन जी रहा है और इसीलिए यह सम्मान देने योग्य इंसान है।

लेकिन हमारी भारतीय सभ्यता इससे बहुत ही अलग है अगर हम राजा जनक की बात करें तो वह भी बिल्कुल भी श्रम को कम महत्व नहीं देते थे। कृष्ण भी अपनी गायों को खुद चराते थे।

अगर हम भारतीय इतिहास की बात करें तो महात्मा गांधी भी श्रम को बहुत महत्व देते थे और अपना रोज़ का काम खुद से ही करते थे, वो किसी से अपना काम नहीं करवाते थे।

फिर हम लोगों के अंदर ऐसा भ्रम क्यों बैठा हुआ है कि जो श्रम करता है, वो कम सम्माननीय है। श्रम न करना, मन के द्वारा आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए किया गया एक खेल मात्र है।

श्रम करना शरीर की और आत्मा की जरूरत है, डार्विन का सिद्धांत है, उत्तरजिविता का सिद्धांत, जिसमें जो प्राणी लड़ता नहीं है, अपने जिन अंगों का उपयोग नहीं करता वो धीरे धीरे समाप्त हो जाते है, बिना श्रम के आप अपने शरीर का ही प्रयोग नहीं कर रहे है, उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर आप अपना निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

जिस दिन हम संघर्षों को और काम को सम्मान देना सीख जाएंगे, उस दिन हमारी बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। आज बेरोजगारों में काफी लोग ऐसे हैं कि उन्हें कोई ऐसा काम नहीं मिल पाता है जो समाज की नजरों में सम्मानजनक हो!

ज्यादातर सम्मान वाले काम इस नजरिये से देखे जाते है कि इसमें काम कितना कम है, इसीलिए लोग सालों साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे रहते है और बेरोजगार रहते है।

बेरोजगारी जो हर बार चुनावी मुद्दा भी बनता है, वो इसलिए है क्योंकि लोग श्रम का सम्मान नहीं करते, मेरा व्यक्तिगत रूप से यही मानना है कि जब हम काम करना चाहते हैं तो काम मिल जाता है, उसमें पैसे कम हो सकते है लेकिन काम मिल जाता है।

किसी भी इंसान का सम्मान इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि वो सफल हुआ या नहीं? उसको पैसे मिले, कितने मिले, बल्कि इस आधार पर करना चाहिए कि उस इंसान ने अपने उद्देश्य को पाने के लिए मेहनत कितनी की थी और कितने दिल से की थी, साथ ही उसका उद्देश्य कितना सच्चा था अगर उसकी मेहनत सच्ची है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

यही नजरिया बेरोजगारी को कुछ हद तक कम करने का शायद सबसे अच्छा और सबसे सही तरीका हो सकता है, तब ही ज्यादा से ज्यादा लोग संघर्ष को गले लगाकर कुछ नया, कुछ लीक से हटकर करने का जोखिम उठा पायेंगे क्योंकि तब लोगों के द्वारा उपहास की आशंका कम हो चुकी होगी।

शुभकामनाएं 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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मेरी आदर्श- मीराबाई(साहस और प्रेम की प्रतिमा) - सौम्या गुप्ता

एक बार यूं ही बैठे बैठे मैं सोच रही थी कि मैं इतिहास की छात्रा रह रही हूं, अगर मुझसे कोई पूछे कि भारतीय इतिहास में कौन सा पात्र तुमको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, तो मन में अशोक, अकबर जैसे कुछ नाम आए पर मन को संतोष नहीं हुआ। फिर मुझे कबीर, मीराबाई, सूरदास इन महान लोगों के नाम याद आए। कबीर जी भी मेरी दृष्टि में बहुत अच्छे कवि हैं, उनकी तर्किक बातें और धर्म की बुरी बातों पर आलोचना मुझे सच में बहुत प्रभावित करती है। सूरदास ने भी कृष्ण के बचपन का जो वर्णन किया है वह अद्भुत है। इतनी सारी खूबियों से प्रभावित होने के बाद भी मुझे "मीराबाई" का चरित्र सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

अब बात आती है ऐसा क्यों?

 इसका एक कारण  है उसे आप भावनात्मक भी कहा सकता है, क्योंकि कृष्ण मेरे भी आराध्य हैं, कृष्ण सूरदास के भी अराध्य हैं पर उनसे थोड़ा सा कम प्रभावित हूं। मीराबाई का उद्देश्य था कृष्ण प्रेम, उसके लिए उन्होंने सारे जतन किए, यहां कृष्ण को आप "सच्चे उद्देश्य" से जोड़कर देखेंगे तो ज्यादा व्यापकता से समझ पाएंगे।

मीराबाई का साहस मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, उस समय जब औरतें घूंघट से बाहर नहीं झांक पाती थीं, उस वक्त भक्ति में मगन मीरा झूठी लोक लाज त्याग कर वृन्दावन चली जाती हैं। उस समय जब स्त्रियां घर में बोलती भी नहीं थी, उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जिया। तुलसीदास को पत्र लिखा और उनके उत्तर पर कि जिनके हृदय न राम वैदेही,

तजिये ताहि कोटि बैरी सम।

अपना घर छोड़ दिया, इतना साहस उनमें कृष्ण प्रेम के कारण ही आया। ऐसा नहीं था वह केवल कृष्ण से प्रेम करती थी, उन्हें सब की फिक्र थी, उनको विष देने वालों की भी। मेरे लिए मीराबाई एक आदर्श है, वह कृष्ण के प्रेम में डूबी, पर उनका प्रेम उनका साहस बना, उनको ऊंचाईयां दी, उनको अमर कर दिया।

वह मुझे महिला सशक्तीकरण की अग्रदूत लगती हैं, कि मैं यह लक्ष्य चाहती हूं और अगर लक्ष्य सही है, सच के साथ और जनहित या आत्म उन्नति के लिए है तो सबकुछ कुबूल है, घर छोड़ना, बाहरी आंधी-पानी, असुरक्षा। वो चाहती तो रोती रहती कि मेरी भक्ति में मेरे ससुराल वाले ही बाधक बन रहे हैं, पर उन्होंने रोना नहीं लड़ना चुना, सांप भेजो, विष भेजो, मीराबाई को सब स्वीकार था क्योंकि उनके पास कृष्ण आज के संदर्भ में सही उद्देश्य था।

वह दर्पण सी पवित्र बनी। आज की स्त्री चाहे तो अपने उद्देशय को ना पाने का कारण दूसरों को बताती रहे, या तो लड़ जाए। मैंने एक बार कहीं सुना था और यह बात मेरे संघर्षों के दौर में ज्योति बनकर मेरे साथ रहती है कि 

"कृष्ण है तो जहर का प्याला आएगा ही",

 जहर का प्याला नहीं आया है तो मान कर चलना कि कृष्णा भी नहीं मिले हैं।  

मैं कृष्ण पर ध्यान केन्द्रित करती हूं और जहर का प्याला अपने आप ही अमृत में बदल जाता है, जैसे मीरा बाई का बदल जाता था।

यहां पर कृष्ण सिर्फ भगवान कृष्ण से नहीं है, कोई भी उद्देश्य यदि सच्चा है तो उसके लिए हमारे भीतर मीराबाई सा समर्पण होना चाहिए।

शुभकामनाएं 

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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शुभकामनाएं

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पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पुरूषों की समस्याएं- सौम्या गुप्ता

संपूर्ण पुरुष समाज को समर्पित:-

मैं बचपन से ही इस बात को लेकर बहुत चिढ़ती थी कि भगवान ने मुझे लड़की क्यों बनाया? इतनी पाबंदियाँ झेलनी पड़ती है। लेकिन जब थोड़ी समझदार हुई, तो समझ आया कि लड़का होना भी आसान नहीं है। घर में अगर एक बेटा हो या बड़ा बेटा हो तो पिता की तबियत बिगड़ते ही वह बड़ा बेटा, चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, घर की सारी जिम्मेदारी संभालने की कोशिश में लग जाता है। मैंने महिलाओं को अक्सर यह कहते सुना है कि हमें तो कभी छुट्टी नहीं मिलती, और एक सीमा तक यह सच भी है कि महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं।

पर एक पक्ष यह भी है कि महिलाएँ बीमार होने पर थोड़ा कम खाना बना सकती हैं, कुछ काम कम कर सकती हैं, अगर परिवार अच्छा है तो, पर पुरुषों के पास यह सुविधा नहीं होती। लगभग हर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष न बीमार होने पर जल्दी डाॅक्टर के पास  जा पाता है, न कोई छुट्टी लेता है। जब तक वो ल़डका रहता है,घर की जिम्मेदारियों से तालमेल, फिर बहन की शादी, फिर अपनी शादी और घर में वो भी उलझा सा ही रह जाता है।

भावनात्मक रूप से अगर कोई पुरुष टूट भी जाए, तो वो किसी के सामने रो भी नहीं सकता क्योंकि हमारे समाज में ये भ्रम फैला हुआ है कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'। लड़कियों और महिलाओं से ये अभिव्यक्ति तो नहीं छीनी जाती। मुझे लगता है कि ये धारणा टूटनी ही चाहिए और महिलाओं को ये मोर्चा उठाना चाहिए कि वो हर तरह के इमोशन को अभिव्यक्त कर सकें और साथ ही पुरूषों को भी अपनी हर तकलीफ़ साझा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकें, ऐसा महिलाओं को ही इसलिए करना चाहिए कि वो ही माँ, बहन, पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन में सिखाने में सबसे अहम् भूमिका निभाती है।

अमूमन पुरुषों में हार्ट अटैक तथा अन्य ऐसी ही तनाव से जुड़ी हुई बीमारियों ज्यादा होती है क्योंकि वो अपने इमोशन को दबाकर करते है। मैंने पढ़ा था कही 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' पर इस समाज को और देश को जितनी महिलाओं की जरूरत है उतनी पुरुषों की भी।

आज झूठे महिला सशक्तिकरण की आड़ में पर जो महिलाएँ यह कहती है कि पुरुषों ने हमारा दमन किया है तो अब हम भी करेंगे, उनसे मेरा कहना है कि हमारी शक्ति सृजन की है, विनाश की नहीं। दुनिया को आधा पुरुषों ने नष्ट कर दिया तो दुनिया को आधा हम भी नष्ट करेंगे- ये नहीं करना।

साथ मिलना है महिला और पुरुष दोनों को, चेतना के स्तर पर दोनों एक हो और दोनों मिलकर इस समाज, देश और दुनिया को बचाएं।

"इस दुनिया को प्यार की जरूरत है, बदले की नहीं। "

जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाते है, हम सबको जरूरत है कि हम उनके प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाए।

पुरुषों में भी संवेदना होती है, आप जयशंकर प्रसाद की रचना, नारी तुम केवल श्रद्धा हो, रचना पढ़ सकते है। कितने ही गाने ऐसे है जिनमें महिलाओं को पुरुष कितना अच्छे से समझ सकते है उनको आप समझ सकते हैं, एक गाने की लाइन है, मेरी छाया है जो, आपके घर चली, सपना बनके मेरी आँखों में है पली, मैंने जब ये देखा कि इसको लिखने वाला भी एक " पुरुष" है तो मेरे लिए ये चौकाने वाली बात थी, इसीलिए पुरुषों के प्रति अपनी अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है।

शुभकामनाएं 

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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शुभकामनाएं

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उभरते सवाल 24.11.2025

 लगातार बारिश से हो रहे भूस्खलनों ने इंडोनेशिया और वियतनाम में दर्जनों लोगों की जान ले ली है। पुर्तगाल एक बवंडर की चपेट में आया और नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है कि मुंबई में मॉनसून के दौरान होने वाली मौतों में से 8 फीसदी से अधिक बारिश की वजह से होती हैं। इनसे ज्यादातर कमजोर वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। इस वर्ष की पहली छमाही में ही मौसम संबंधी दिक्कतों के कारण 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। यह भविष्य का जोखिम नहीं बल्कि यह बदलती जलवायु की कठोर हकीकत है।

- राज्यों में अधिक ऋण से सामान्य सरकारी ऋण और उधारी की जरूरतें बढ़ जाती हैं, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था के लिए धन की लागत प्रभावित होती है। राज्यों के बीच आय अंतर को कम करना और ऊंचे स्तर के ऋण मसले का समाधान करना प्रमुख नीतिगत चुनौतियां हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वित्त आयोग इन मुद्दों से कैसे निपटता है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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जानकारी 24.11.2025

यूके की आतंरिक खुफिया एजेंसी एमआई ने अपने देश के सांसदों को चीनी छद्म-नियोक्ताओं से आगाह किया है। एजेंसी को खबर मिली है कि दरअसल ये चीनी जासूस हैं, जो ब्रिटेन सहित कई बड़े देशों में सांसदों व अन्य प्रभावशाली लोगों को किसी काम के बहाने भारी राशि देते हैं और उनसे खुफिया जानकारी लेते हैं। चीन ने इसी स्कीम के तहत पिछले 20 वर्षों में जहां दुनिया के अनेक गरीब देशों को एक ट्रिलियन डॉलर (भारत के बजट से दूना) दिए हैं, वहीं अमेरिका और ब्रिटेन को भी इतना ही पैसा दिया है। लेकिन इन्हें देने का तरीका छद्म है। इस योजना के तहत चीनी बैंक पहले चीनी टेक कंपनियों को कर्ज देती है। फिर ये कंपनियां अमेरिकी टेक कंपनियों से समझौता करती हैं। ताकि उनकी टेक्नोलॉजी हासिल हो सके। शोध संस्था एड्सडाटा के अनुसार अमेरिका की कई कंपनियां इसे सामान्य व्यापारिक समझौता समझकर अपनी टेक्नोलॉजी चीनी कंपनियों से शेयर कर देती हैं, जिसके जरिए चीन अपने टेक ज्ञान को आगे संवर्धित करता है। जबकि ट्रम्प ने अमेरिकी कंपनियों को अपने बेहतरीन सेमी-कंडक्टर्स और जीपीयू को चीन को बेचने से मना किया है। लेकिन चीन मध्यम दर्जे के सेमीकंडक्टर्स के सहारे भी डीपसीक एआई बनाने में सक्षम रहा। चीनी मंसूबों से हमें भी सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चीनी चिप्स भारतीय सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं।- दैनिक भास्कर संपादकीय 21.11.2025

- सोलहवें वित्त आयोग ने इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, हालांकि उम्मीद है कि इसे 2026 के बजट सत्र में संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाएं अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले पांच वर्ष के लिए होंगी। ये अनुशंसाएं केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण को आकार देने के अलावा विभिन्न श्रेणियों के तहत राज्यों के बीच फंड आवंटन से संबंधित होंगी

- एक संघीय ढांचे में हमेशा यह उम्मीद रहेगी कि जो राज्य पिछड़ रहे हैं उन्हें मदद पहुंचाई जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिक समतापूर्ण विकास संभव हो सके। इसके अलावा आंकड़े दिखाते हैं कि प्रति व्यक्ति आधार पर दक्षिण भारत के राज्यों के संसाधन बेहतर हैं।

- चालू वर्ष में केरल की प्रति व्यक्ति व्यय 86,000 रुपये से अधिक है, बिहार में यह केवल 24,000 रुपये के करीब है। ध्यान देने वाली बात है कि 2020-21 और 2025-26 के बीच देश के सबसे गरीब राज्यों में प्रति व्यक्ति व्यय आय बढ़कर करीब दोगुना हो गया है। हालांकि इसका आधार कम रहा है जबकि अमीर दक्षिण भारतीय राज्यों में यह समेकित स्तर पर 59 फीसदी तक बढ़ा है।

- यद्यपि, व्यय में तेज वृद्धि आय में तेज वृद्धि में परिवर्तित नहीं हुई है। दक्षिणी राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति आय 2009-10 में गरीब राज्यों की तुलना में 2.1 गुना थी, जो अब बढ़कर 2.8 गुना हो गई है। इससे संकेत मिलता है कि गरीब राज्यों को विकास कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए कर बंटवारे में अधिक हिस्सेदारी आवश्यक हो सकती है, लेकिन यह तीव्र आर्थिक वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। तीव्र आर्थिक वृद्धि ही प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर इस अंतर को कम करने में मदद कर सकती है।

- केंद्र और राज्यों के समक्ष एक और चुनौती है। कुछ राज्यों पर बहुत अधिक ऋण है, जो विकास की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 19 राज्यों में बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 30 फीसदी से अधिक हैं, जिनमें केरल भी शामिल है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह जीएसडीपी के 40 फीसदी से भी अधिक है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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