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मौसम विज्ञान विभाग
वसुधा अपना विस्तार लिए, सारे मौसम श्रृंगार किए,
कुछ गूढ़ रहस्यों से गुज़री।
कभी नभ में दिखती काली घटा, नीले सागर की नभ में छटा, गर्जन करती सहसा बिजली नभ से क्यों धरती पर उतरी?
क्यों प्यास भी प्यास से तड़पी है? उच्छवास वहां क्यों मरती है ?
क्यों दूजी और हवा शीतल? खुशियां भी हिलोरे हैं भरती |
क्यों सूर्य प्रखर और तीक्ष्ण यहां ? क्यों चंदा सा शीतल है वहां?
यहां बादल खेल रहे होली, क्यों ढूंढ रहे हैं वहां चोली?
क्या गोल धरा है इसीलिए, या मायाजाल कोई रचती ?
हाय! विपदा है कैसी अब आई? कुछ तो ये चेताती हरजाई| जिनको था भान वो बच भी गए, बिन ज्ञान के जान कहां आई?
कहीं उठती खुशियों की तफ़री, कहीं विपदा से उठती अर्थी |
पर जीवन सारे मोल समान,
चलते पटरी , उड़े आसमान,
चेतन के ऐसे भाव लिए,
नवयुग का मन उद्धार लिए,
खुलते रहस्य की धार लिए,
मानवता के प्रति बस प्यार लिए,
विज्ञान की गंगा भगीरथ संग,
आकाश से पृथ्वी पर उतरी|
इस ज्ञान की गंगा साथ लिए ,
सारे रहस्य को साथ लिए,
तारण करने मानवता का,
बस ज्ञान की बरछी हाथ लिए,
हर खतरे का आभास लिए,
इक सेना कुरुक्षेत्र उतरी|
कुछ घाव मिले थे अभावों में,
रहते थे पांव भी छालों में
हर मौसम का मौसम समझें,
जिज्ञासा थी मतवालों में,
"आदित्यात् जायते वृष्टिः" के कौर लिए वो थालों में,
चलते रातों में उजालों में।
अठरह सौ पचहत्र कलकत्ता,शिमला फिर पुणे से आगे
"अन्वेषण" के संस्कार लिए, वो सेना दिल्ली में ठहरी|
आकाश से धरती के मौसम,
हर राज्य बराबर संप्रेषण, विपदा का पूर्व ही अनुमान,
यदि नहीं तो रक्षित हो जीवन,
बस ऐसा सेवा भाव लिए,
मौसम विभाग ने भारत में कर लिया जनम |
मां जैसी सबकी बलाएं लिए,
और बहन सा राखी कवच लिए,
हर विपदा से रक्षा करने,
मौसम विभाग ने शपथ धरी ।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?
'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।
इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?
इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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आज से कुछ समय पहले पापा और उनके मित्र धर्म, राजनीति, समाज इन सब विषयों पर कुछ बातें कर रहे थे। उसी समय मैं वहां पहुंची और मैंने एक प्रश्न का उत्तर बहुत ही शानदार तरीके से दिया और कुछ देर तक मैं उन लोगों से बात भी करती रही जिन मुद्दों पर वे लोग बात कर रहे थे। पर मेरा तरीका थोड़ा सा तर्किक और अकादमिक स्तर का था। कुछ देर बाद ही पापा के मित्रों ने मुझे वहां से जाने के लिए कह दिया और कहा कि ये बाते बच्चों को नहीं करनी चाहिए। मुझे राजनीति, धर्म, समाज, दर्शनशास्त्र इन सभी विषयों पर बात करते हुए बहुत अच्छा लगता है और मुझमें इनकी एक स्तर की समझ भी है। मैंने उस समय सोचा कि क्यों मैं इन विषयों पर बात नहीं कर सकती?
शायद आज के समाज का एक हिस्सा लड़कियों को ऐसे मुद्दे जो पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे उन पर लड़कियों को बात करने ही नहीं देना चाहता!
ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि इस तरह वो दुनिया की आधी आबादी की विश्लेषण क्षमता और समझ का लाभ लेने से चूक रहे हैं, अगर न चूके तो दुनिया और बेहतर तथा संवेदनशील हो सकती है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे
- अब हमें साफ्टवेयर निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करनी होगी और सेवा निर्यात की संभावनाओं वाले अन्य देशों में कदम बढ़ाने होंगे। हमें नए दौर की तकनीकी जरूरतों और उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण से नई पीढ़ी को सुसज्जित करना होगा। सेवा निर्यात बढ़ाने के लिए शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ना होगा। देश के कोने-कोने खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों को भी सेवा क्षेत्र से जोड़ने के प्रयास करने होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे प्रयासों से देश का सेवा क्षेत्र और सेवा निर्यात रफ्तार पकड़ेगा तथा इससे भारत को वर्ष 2027 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और वर्ष 2047 तक विकसित देश बनाने के बड़े लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।
- गतिशीलता में भी चीन आगे है। उसने इलेक्ट्रिक वाहनों पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है। 2024 में चीन ने वैश्विक इलेक्ट्रिक कार बिक्री का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अपने नाम किया। घरेलू बाजार में हर महीने बेची जाने वाली आधी कारें इलेक्ट्रिक हैं और दुनिया के शीर्ष 10 इलेक्ट्रिक वाहन के ब्रांडों में से छह अब चीनी हैं। चीन के वाहन अब उभरते बाजारों पर कब्जा कर रहे हैं। चीन में 100 से अधिक कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बनाती हैं। एआइ के नए माडल बनाने में अब भी अमेरिका आगे है, लेकिन जब एआइ का फोकस “नवाचार” से “विस्तार” पर शिफ्ट हो रहा है, तो असली जीत सिर्फ माडल की बेंचमार्क से नहीं, बल्कि कंप्यूटर के लिए ऊर्जा, डाटा की उपलब्धता, नियामक गति और एप्लीकेशन अपनाने की दर से तय होगी।
-- ड्रोन विशेषज्ञ बाबी सकाकी के अनुसार, “डीडेआइ हर साल लाखों ड्रोन बना सकता है, जो अमेरिका की तुलना में सौ गुना अधिक है।” अमेरिका सबसे उन्नत युद्ध ड्रोन बनाता है, लेकिन उनकी कीमत 6 से 13 मिलियन डालर तक होती है। युद्ध के सिद्धांत अब सस्ते ड्रोन, मानव रहित विमान की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें चीन उत्कृष्ट है। इसी बीच अमेरिका के एफ-35 कार्यक्रम की कुल लागत 1.58 ट्रिलियन डालर तक पहुंच गई है, जिससे भविष्य के रक्षा निवेशों के लिए जगह घट गई है।
- वैश्विक स्तर पर बन रही इस स्थिति में प्रासंगिक बने रहने के लिए भारत को अपनी विकास रणनीति को तीन बातों पर केंद्रित करना चाहिए- बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन, अपने घरेलू बाजार से परे निर्यात बाजार की खोज और अग्रणी तकनीक तक पहुंच। इन तीनों में चीन का वर्चस्व है। भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” रणनीति समझदारी भरी है, लेकिन अब गणित कहता है कि थोड़ा झुकाव जरूरी है। जहां चीन के साथ गठबंधन भारत के हित में हो, वहां वह साझेदारी करे और बाकी मुद्दों को अलग रखे। इसका अर्थ चीन के अधीन होना नहीं है, बल्कि उन विशिष्ट मुद्दों पर सहयोग है, जो भारत की राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करें।
- भारत के तटीय क्षेत्र, पारिस्थितिकी रूप से सबसे नाजुक क्षेत्रों में से हैं।
- एआई के लिए डेटा केंद्र
इन संयंत्रों की पानी की जरूरतें बहुत ज्यादा होती हैं क्योंकि इनके कूलिंग तंत्र हर साल लाखों लीटर पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। ज्यादातर इनकी स्थापना उन क्षेत्रों में हो रही है जहां पानी की कमी है, जैसे मुंबई और चेन्नई । कुछ परिचालक अब हवा से ठंडी करने वाली या क्लोज्ड लूप सिस्टम अपना रहे हैं, लेकिन ये विकल्प अब भी सीमित हैं। कई केंद्र अब भी पानी की बहुत खपत करने वाले वाष्पीकरण कूलिंग पर निर्भर हैं। डेटा केंद्र बड़ी मात्रा में बिजली की भी खपत करते हैं। वैश्विक अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2030 तक, वे दुनिया की 8 फीसदी तक बिजली उपयोग कर सकते हैं। भारत में, इस क्षेत्र की बढ़ती बिजली की मांग ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव डालती है। भारत का ग्रिड अब भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है, जिससे कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
- दुनिया भर की समाचार रिपोर्ट (ब्राजील, ब्रिटेन, चिली, आयरलैंड, मलेशिया, मेक्सिको, नीदरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और स्पेन से ) यह दर्शाती हैं कि जैसे-जैसे तकनीकी कंपनियां एआई को आगे बढ़ाने के लिए डेटा सेंटर बना रही हैं, वैसे ही कमजोर समुदायों को बिजली कटौती और पानी की कमी का सामना करना पड़ा है। इन गैर-टिकाऊ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले तरीकों को लगातार जारी रखने से रोकने के लिए, भारत को डेटा केंद्र विस्तार के हर चरण में पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल करना होगा। इसका मतलब है कि अक्षय बिजली स्रोतों का उपयोग करना, ऊर्जा कुशल बुनियादी ढांचा अपनाना और साथ ही, अत्याधुनिक कूलिंग तथा पानी को रिसाइक्लिंग करने वाली प्रणालियां लागू करना जरूरी है।
- डिजाइन और संचालन में टिकाऊपन को शामिल कर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि डेटा संचालित उसकी यह वृद्धि आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों का समर्थन करे और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करे तथा कार्बन उत्सर्जन कम करे। हरित बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर, कुशल जल प्रबंधन और अक्षय ऊर्जा को अपनाकर, भारत खुद को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार डिजिटल विकास में एक वैश्विक अगुआ के रूप में स्थापित कर सकता है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
जानकारी 15.11.2025
- हाल में आए एक आंकड़े से पता चला कि चीन अमेरिका की तुलना में 2.5 गुना ज्यादा बिजली उत्पन्न करता है और उसका लक्ष्य हर साल “एक जर्मनी” के बराबर बिजली उत्पादन जोड़ने का है। एलन मस्क का भी कहना है कि अगले तीन-चार वर्षों में चीन में सौर ऊर्जा का उत्पादन अमेरिका के सभी स्रोतों से संयुक्त रूप से अधिक होगा। वास्तव में भविष्य को आकार देने वाली तकनीक के युग में चार तकनीकें तय करेंगी कि कौन आगे रहेगा- ऊर्जा, गतिशीलता (मोबिलिटी), एआइ और युद्ध की रणनीति (वारफेयर)।
- 2024 में चीन ने 14.4 गीगावाट हाइड्रोपावर जोड़ी, जो कई देशों के कुल उत्पादन से अधिक है और 58.7 गीगावाट पंप्ड-स्टोरेज हाइड्रो तक पहुंच गया है एवं 200 गीगावाट से अधिक निर्माणाधीन है। वह परमाणु ऊर्जा में भी सक्रिय है, जहां 30 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। कम वाणिज्यिक बिजली दरों और विशाल विनिर्माण की बदौलत बैटरी क्षेत्र में चीन ने फिर से ग्लोबल सप्लाई-चेन रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया है। सौर विनिर्माण की हर अवस्था में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है। ऊर्जा वह कच्चा माल है, जो बाकी सभी मूलभूत तकनीक को चलाएगा। चीन इसमें में काफी आगे निकल चुका है और उन कीमतों पर, जिनसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
-- सच्चाई यह है कि जहां अमेरिका बेहतर माडल बनाने का जश्न मना रहा है, वहीं चीन ने यह सुलझा लिया है कि उन्हें वास्तव में चलाएगा कौन। पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का स्वरूप भी बदल गया है। अब युद्ध सस्ते ड्रोन और घूमने वाले गोला-बारूद से लड़े जा रहे हैं, न कि महंगे टैंकों और विमानों से। ड्रोन निर्माण में चीन का वर्चस्व है। उसकी कंपनी डीडेआइ के पास वैश्विक ड्रोन बाजार का 70 प्रतिशत हिस्सा है। इसके मैविक ड्रोन के माडल 300 से 5,000 डालर के बीच आते हैं।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
अरे राजेश, ये किताब क्यों पैक कर रहे लिफाफे में?
मनीष भाई, गिफ्ट पैक हो रहा है गिफ्ट, अपने अतुल भाई की शादी के लिए।
अबे ! शादी में किताब कौन देता है?
क्यों? जरूरी है क्या जो परंपरा चल रही है उसी हिसाब से चले, कुछ नया नहीं कर सकते ?
भाई, मेरा मतलब है कि एंजॉयमेंट के दिन किताब !
अरे मनीष भाई उस दिन पढ़ने के लिए थोड़ी न है, यह तो एक पहल है कि जब दो लोग एक साथ मिल रहे हैं, एक दूसरे को उन्नति देने, एक दूसरे का साथ देने, एक दूसरे का ख्याल रखने को तो क्यों ना उस नेक काम की शुरुआत के आधार में एक अच्छी किताब हो, जिसकी कहानियां, नवयुगल में संवेदनशीलता लाएं, परस्पर सम्मान की भावना लाएं, एक दूसरे की गरिमा का सम्मान करने की इच्छा लाए, एक दूसरे की व्यक्तिगत चॉइस के साथ सामंजस्य बनाने की और समन्वय स्थापित करने की क्षमता निर्माण पर इशारा करें। इससे बढ़िया गिफ्ट और क्या हो सकता है जो उनकी शादी में प्रेम और आपसी सम्मान भरे और असहमति के बजाय सहमति के मुद्दों पर जोर देने को प्रेरित कर, हर निर्णय के केंद्र में जीवन की शांति को रखने को प्रेरित करें।
वह राजेश भाई बढ़िया लेक्चर देते हो, लेक्चर बाज आदमी हो एकदम, हाहाहा....
हां भाई क्यों नहीं, मेरे लेक्चर से अगर किसी के जीवन में शांति आ जाए तो मैं लेक्चर बाज ही सही।
दोनों हंसने लगते हैं..
एक नई पहल, एक बेहतरीन किताब, एक अमूल्य भेंट का रूप ले चुकी थी।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
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मधुरिमा को खिलखिलाते हुए हंसते देखकर
चेष्टा ने चौंक कर पूछा, अरे मधुरिमा तुम तो कह रही थी कि हंसना भूल गई हो, केवल मुस्कुराती हो, यह अचानक बदलाव कहां से आ गया कि इतना खुलकर हंस रही हो ?
मधुरिमा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, हां चेष्टा पहले मैं मुस्कुराती ही थी बस क्योंकि कुछ उत्साह की कमी थी, कुछ निराशा के बादल थे, लेकिन अब कुछ लोगों से मिलकर, उनसे बात करके यह समझ आया है कि संघर्ष और दिक्कतें बहुत लोगों के जीवन में रहती हैं। हमें यह सोचकर निराश नहीं रहना चाहिए कि हमारे पास समय या संसाधन कम हैं, हमारा नजरिया यह होना चाहिए कि कुछ लोगों के पास इतने भी संसाधन नहीं है, तो क्यों ना इतने ही संसाधनों में जो बेहतर हो सके वह करें हम क्यों उस चीज के पीछे भागे जिसके लिए संसाधन नहीं है, फिलहाल जिन चीजों के लिए संसाधन है उनके लिए प्रयास करें, अपने पैरों पर खड़े हों और अपने इन्हीं कम संसाधनों में ही हम अपने से भी कम संसाधनों वाले लोगों की मदद कर सकते हैं और दूसरों के लिए की गई मदद से जो संतुष्टि की अनुभूति होती है वह लाजवाब है। उस अनुभूति ने ही मुझे ये हौसला दिया है कि मैं बहुत बड़ा भले कुछ ना कर पाऊं लेकिन अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ लोगों के जीवन में मुस्कान ला सकती हूं और यह स्पष्टता और विश्वास मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं अपनी परिस्थितियों पर ही हंस सकूं और यह परिस्थितियां मुझ पर नहीं, मैं इन परिस्थितियों पर हंस सकूं। ये मेरी खिलखिलाहट भरी हंसी इस विजय का प्रतीक है।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमता और डेटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में शोध एवं विकास तथा नवउद्यम के अनुकूल माहौल से अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने केंद्र यहां खोलना चाहती हैं।
- इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन का भारत समेत पूरी दुनिया में प्रभाव साफ दिखने लगा है। ब्राजील के बेलेम में आयोजित काप 30 सम्मेलन में बुधवार को जारी 'जलवायु जोखिम सूचकांक-2026' की रपट में कहा गया है कि जलवायु आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत नौवें स्थान पर है। पिछले तीन दशकों में देश में जलवायु आपदाओं के कारण करीब अस्सी हजार लोगों की जान जा चुकी है।
- अगर वैश्विक स्तर पर बात करें तो पिछले तीन दशकों में नौ हजार से अधिक मौसमी आपदाओं ने आठ लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी लील ली है। यह बात छिपी नहीं है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर उन्हीं विकासशील देशों को झेलना पड़ रहा है, जिनकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भागीदारी सबसे कम है। विकासशील देश कमजोर सहन क्षमता और अनुकूलन के सीमित संसाधनों के कारण ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
- भारत सहित कई विकासशील देशों में जलवायु आपदाएं सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं, जिसके लिए तत्काल और व्यापक वित्त पोषित अनुकूलन उपायों की जरूरत है। यह जगजाहिर है कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों का योगदान सबसे ज्यादा है, इसलिए अनुकूलन उपायों को लेकर उनकी जिम्मेदारी भी अधिक होनी चाहिए। उनकी भूमिका सिर्फ वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कार्बन उत्सर्जन में कमी और कमजोर देशों के अनुकूलन प्रयासों का समर्थन करना भी शामिल है।
- भारत सेवा निर्यात में भले ही नई ऊंचाई हासिल करते हुए वैश्विक सेवा निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, मगर इस मामले में उसके सामने चुनौतियां भी कम नही हैं। इनमें सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, सभी क्षेत्रों में कारोबार बढ़ाने, ग्रामीण और छोटे शहरों में शोध एवं नवाचार के साथ-साथ युवाओं में कृत्रिम मेधा (एआइ) जैसे कौशल विकसित करने की चुनौतियां प्रमुख हैं।
- सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- - फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ओपन एआइ के प्रमुख सैम आल्ट मैन के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धिमता के लिए दुनिया में भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। वहीं, गुगल के सीईओ सुंदर पिचाई का मानना है कि भारत इस क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। इस समय भारत में कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र का काफी तेजी से विस्तार हो रहा है। इस वर्ष भारत का कृत्रिम बुद्धिमता का बाजार 13.05 अरब डालर मूल्य की ऊंचाई पर है, जिसका आकार वर्ष 2032 में 130.63 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। भारत में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र में वर्तमान में साठ लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं। देश में लगभग 1.8 लाख नवउद्यम हैं और पिछले वर्ष शुरू किए गए नवउद्यमों में से करीब 89 फीसद ने अपने उत्पादों या सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमता का उपयोग किया है।
-इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।
- ऐसे में भारत को सेवा क्षेत्र को और मजबूत करते हुए सेवा निर्यात में तेजी लाने की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि अभी भी भू-राजनीतिक रूप से भारत का सेवा क्षेत्र देश की व्यापक आर्थिक असमानता को दर्शाता है। देश में कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु उच्च मूल्य वाली सेवाओं मसलन- सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और अचल संपत्ति में दबदबा रखते हैं
- इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि देश अपने संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, और अर्थव्यवस्था के औपचारिक एवं शहरीकृत होने के साथ-साथ सेवा क्षेत्र में और भी ज्यादा कर्मचारियों को शामिल करने की क्षमता मौजूद है।
- सेवा क्षेत्र में लैंगिक समानता पर भी ध्यान देना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 10.5 फीसद महिलाएं सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 60 फीसद है।
- यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
चलो जवानी की गलियों में,
बचपन की मुस्कानखोजने,
चालाकी से भरे स्वरों में,
वो मासूम ज़ुबान खोजने,
"आँखों में" खिलते सपनों से,
नींदें जो भी टूट गई थी,
चलो आज फिर उन
"नींदों में" फिर से
वही उड़ान खोजने।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
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कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?
'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।
इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?
इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।
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एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था..
माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था..
क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।
इसलिए चाहे सिर पर न हो बाल
तब भी जीवन जियो बच्चों सा धमाल
यदि है जीवन में कुछ उमंग
कुछ शौक, कुछ तरंग
लगते हो तब ही जीवित से
वरना लगे जीवन में है बैरंग
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
- डॉ अनिल वर्मा
डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
इनके द्वारा शिक्षण और साहित्य के अध्ययन/अध्यापन का अनुभव एक बेहतर समाज के लिए उपयोगी है |
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