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Questions: Aviation meteorology and aviation

Question to assess understanding of students/participants

Part-A:  Answer the questions by choosing one of the two options given with each question:

  1. Head wind is wind
  1. Opposite to motion of aircraft                                            (b)  Along the motion of aircraft
  1. Tail wind is wind
  1. Opposite to motion of aircraft                                            (b)  Along the motion of aircraft
  1. For a taking off aircraft the head wind in general
  1. Helps to take off easily                                                         (b) Doesn’t help in take-off
  1. For a landing aircraft the tail wind beyond a limit
  1. Is safe for operation                                                                  (b) is unsafe for operation
  1. Increment in temperature ……………….. the capacity of aircraft to lift  with passengers and load.
  1. Increases                                                                                 (b)decreases
  1. Decrement in temperature ……………….. the capacity of aircraft to lift  with passengers and load.
  1. Increases                                                                                 (b)decreases
  1. Rapidly decreasing pressure is indication of
  1. Bad weather                                                                           (b) Good weather
  1. Wind blows from ………………..to……………………….. pressure
  1. High to low pressure                                                             (b) low to high pressure
  1. In case of Fog and continuous rain at ground the Dew point and temperature are
  1. Nearly equal                                                                 (b) quite different
  1.  Hot air is ………………………………..than cold air. (lighter/heavier)
  2. Hot air lifts up because it is ………………………………. Than cold air. (lighter/heavier)

Part B: Answer the following questions (1 Mark for each)

  1. Officers at airport directly communicating with pilot, guiding them about flight levels and  giving permission for landing take-off.

               ……………………………………………………………………

  1. Engineers responsible for upkeep, maintenance and standby of communication, navigation and surveillance equipments

…………………………………………………………………………………

  1. Team responsible upkeep/maintenance of runway and other structure related facilities crucial for aviation operation.

………………………………………………………………………………………..

  1. Team responsible for upkeep/maintenance of electrical equipments necessary for safe aviation operation.

……………………………………………………………………………………………

  1. Team responsible for preparedness and immediate action in case of fire in aircraft or airport building/facilities

………………………………………………………………………………………………

  1. Team responsible for security of airport, aircraft, passengers and airport personnel.

…………………………………………………………………………………………………

Part C: Match correct entries by drawing line b/w column-1 and column-2

S.No.

Column-1

Column-2

1

Anemometer

Pressure

2

Windvane

Wind speed and direction

3

barometer

Runway

4

Windsock

Wind direction

5

ATRH

Cloud

6

Central line

Wind speed

7

Convection

Air temperature and relative Humidity

 

Part D: Write the answer in one line

  1. Purpose of meteorological services for aviation

 

  1. Subjects closely related for meteorology

 

  1. Full form of DWR

 

 

  1. name any 5 meteorological instruments

 

  1. Condensation starts when dew point and air temperature becomes……………

Part E: Write full form of following

  1. ATCO
  2. CNS
  3. HF
  4. VHF
  5. RT
  6. DME
  7. RADAR
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युवाओं को संबोधित कुछ लेख- लवकुश कुमार

युवाओं को संबोधित कुछ लेख

  1. लिखना, अपना पक्ष रखना, सही बात को आगे बढ़ाना जरूरी क्यों: एक सोंच

 

समाज में बदलाव हो रहे हैं, कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक कुछ लोग नुकसानदायक और भ्रामक चीजों का प्रसार कर रहे हैं,  कुछ आवाजें अनसुनी रह जा रही हैं। क्यों न हम संगठित होकर, इन अनसुनी आवाजों को ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं, क्यों न हम अपने पक्ष से भी अवगत करायें लोगों को, क्यों न हम जरूरी और सही बातों को ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं, क्यों न हम बदलते समाज को एक बेहतर और समावेशी दिशा देने का नेक प्रयास करें।

समाज में हो रहे बदलाव हमें भी प्रभावित करते हैं देर-सबेर फिर क्यों न हम अपने डेली शेड्यूल में कुछ मिनट इस बात को लिखने में लगाएं कि हम कैसी दुनिया चाहते हैं।

संख्या मायने रखती है आप लिखिए तो सही कि आप कैसी दुनिया चाहते हैं, आपको क्या शिकायतें हैं, फिर मजेदार होगा सामने वाले का पक्ष सुनना ।

"आपके आस-पास कोई भी बदलाव, एक न एक दिन आपको प्रभावित करेगा", जिस तरह आप सड़क पर कितना भी नियम और सावधानी से चलें लेकिन किसी दूसरे की लापरवाही से आपको नुकसान हो सकता है। इसीलिए हम जब अपने जीवन को सुरक्षित और सहूलियत भरा बनाने के लिए दिन के कई घंटे देते हैं तो क्यों न कुछ मिनट अपने विचार साझा करने को भी दें ताकि हम बता सकें कि हम समाज की दिशा किधर को चाहते हैं, फिर ये देखना मजेदार होगा कि हमारी च्वाइस कई मामलों में विरोधाभासी भी हो सकती है।अपना मत और समझ साझा करने में संकोच न करें, जो आंखों से देखा और उम्र के साथ अनुभव किया है उसे साझा करने में संकोच कैसा!

जो इंसान अपनी समझ और आकांक्षाएं साझा नहीं करना चाहता वो समाज से अपनी सहूलियत की दिशा की अपेक्षा कैसे कर सकता है! बिना किसी पूर्वाग्रह के और बिना इस बात की चिंता किए कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे बेधड़क होकर अपनी बात रखिए और दूसरों को भी हिम्मत दीजिए। जो कुछ महसूस कर रहें उसे सामने व्यक्त करने का |

आपका एक लाइन का इनपुट भी मायने रखता है।

#opinion_matters

कई लोगों के सहयोग से एक समावेशी लेख तैयार हो सकता है जो अलग अलग पृष्ठभूमि के लोगों की समझ को बेहतर करने और उन्हें दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील बनाने में काम आएगा, इस तरह हम समाज के कुछ लोगों को बेहतर करने का काम कर पायेंगे।

  1. लिखने के फायदे- एक संक्षिप्त समीक्षा

 

कुछ लोग पूछते हैं की ये जो इतना लिखते हो उसका कुछ फायदा भी होता है क्या कोई पढ़ता भी है?

तो ऐसे सभी लोगों से मेरा कहना है कि 

1. एक वक्त मुझे जब चीजों को जानने की जरूरत थी तो मैने भी पुस्तकें पढ़ीं थीं, जिसे कुछ लोगों ने लिखा था, वैसे ही मैं भी लिख रहा हूं ताकि फिर किसी जिज्ञासु को मेरी लेखनी से कुछ स्पष्टता मिल जाए कोई रास्ता मिल जाए 

2. किरण बेदी मैम ने भी यही कहा कि उन्हे लगता है कि उन्हे अपने अनुभव लिखने चाहिए वो जरूर किसी के काम आयेंगे 

3. और फिर ये जनहित का कार्य है तो देर रात तक जाग भी सकते हो, मन प्रफुल्लित रहता है 

4. अच्छे लोग मिलेंगे, लेखन एक बहुत ही जन उपयोगी काम है अगर आप सच लिख रहे हैं तो, बुद्धि इस तरह के सही काम में लगे रहेगो तो फिजूल में न उलझना पड़ेगा, लेखन एक सृजनात्मक कार्य है और सृजन का आनंद क्या होता है उनसे पूछो जिन्हे बागवानी शरीखे सृजनात्मक कार्यों का शौक है |

5. अगर एक इंसान को भी मेरा लिखा हुआ समझ आ गया या उपयोग का लग गया तो ये लिखना सफल मानूँगा, जब मैंने इतने साहित्य का उपयोग किया तो मै भी क्यों न साहित्य के कोश मे कुछ योगदान दूँ अपनी क्षमता मे |

6. लेखन हमे जीकर दिखाने को भी प्रेरित करता है |

 

3. साहित्य जरूरी क्यों?

ताकि हम अपने आस पास के लोगों के इतर खुद से दूर दराज के लोगों की जीवन, पहनावे और रहन सहन के बारे में जान सकें।

अच्छा जानना क्यों है दूर वालों के बारे में ? ताकि

हम जान सकें अगर उनमें कुछ बेहतर है हमसे, जिसे अपनाया जा सके।

हम जान सकें उनके जीवन के संघर्षों के बारे में ताकि हमें अपनी दिक्कतें बड़ी न लगें।

हम जान सकें उनकी आकांक्षाओं के बारे ताकि जब कभी उनके साथ काम करना पड़े या उनके लिए नीतियां बनाना पड़े तो हम हम उनके व्यवहार और जरूरतों के पीछे का कारण जान सकें।

इस तरह नए लोगों के साथ काम करना आसान होगा।

समाज के एक तबके का इंसान दूसरे तबके के इंसान के बारे में जान ही तब पाता है जब यदि तो वो उनके बीच समय बिताए, या उनके बारे में फ़िल्म देखें या फिर साहित्य ( कहानी, कविता, उपन्यास, लेख, रिपोर्ताज, जीवनियां, आत्मकथा इत्यादि) पढ़ें।

 

फिर वही प्रश्न कि आखिर जानना क्यों है ?

ताकि समाज में आपसी संघर्ष कम हों और सब एक दूसरे को साथ लेकर चलें, एक दूसरे की तकलीफ़ों के प्रति संवेदनशील रहें ताकि स्थायित्व का मार्ग प्रशस्त हो और देश में शांति बनी रहे, जीवन में शांति बनी रहे।

उम्र के एक पड़ाव का इंसान उम्र के दूसरे पड़ाव के इंसान के विचारों और प्राथमिकताओं को जान पाता है, सुविधा असुविधा को जान पाता है नतीजतन तालमेल बिठाकर चलना आसान होता है, जीवन में शांति आती है और क्लेश कम से कम रहता है।

आज का इंसान, अपने पूर्वजों द्वारा अनुभव की गई जीवन और दुनिया की सच्चाई को पुस्तकों द्वारा पढ़कर अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है, जिसमें अफसोस का कोई स्थान न हो, हो तो केवल उत्कृष्टता।

फिर क्या सोंच रहे हैं आप ? देंगे एक घंटा रोज का ? साहित्य अध्ययन को 

और बच्चों को भी मैथ्स साइंस के साथ-२ साहित्य पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे और देश बेहतर और संवेदनशील ( जो दूसरों की तकलीफ़ को समझ सके ) नागरिक देने का प्रयास करेंगे ?

 

कुछ सवाल जिनके जवाब आपको स्पष्टता के साथ पता हो तो बेहतर “

जीवन में सबसे जरूरी क्या है ? डर लालच और मोह से मुक्ति?  सबसे ज्यादा खुशी किस काम में मिलती है?  टिकाऊ खुशी और स्थायी आनंद ? खुशी और आनंद में अंतर क्या है?  उत्कृष्टता से आप क्या समझते हैं ? आत्मनिर्भरता महत्वपूर्ण क्यों है ? जीवन में संघर्षों के क्या मायने हैं? काम में गुणवत्ता को लेकर प्रतिबद्धता जरूरी क्यों है?

 

शुभकामनायें 

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परिवर्तन - संजय सिंह 'अवध' 

परिवर्तन की ओट लिए जब,
कदम समय के चल जाते हैं,
तब नियति का घूँघट ओढ़े,
शिथिल प्रयास भी छल जाते हैं।

परिवर्तन में जो छँट जाते हैं,
नतमस्तक हो झुक जाते हैं,
ऐसे शीश धार से कट कर,
कभी नहीं फिर उठ पाते हैं।

परिवर्तन की राह पकड़ जो,
समय के रंग में ढल जाते हैं,
ऐसे शीश शैल से उठकर,
नभ में सूर्य से बन जाते हैं ।

जब इंकलाब के नारों से
बाधित ये अंतर्मन होता है,
तब ही परिवर्तन पाने को,
चिंगारी से आचमन होता है।

हवन कोई कितने भी कर ले,
जतन सहस्रों कर ले कोई,
परिवर्तन के अटल सत्य से,
चक्र काल का, बच नहीं पाता।

परिवर्तन हो पार्थ के मन में,
परिवर्तित हो शीश कुरु का,
विगत समय की चाल रोक कर,
परिवर्तन, कृष्ण जो कर जाते हैं,
मन में रण हो, या रण में मन,
परिवर्तन की ढाल लिए,
अर्जुन परिवर्तन कर जाते हैं।

परिवर्तन ऋतुओं का होकर,
जीवन में परिवर्तन करता,
जब परिवर्तन ग्रहों का होता,
राम भी उसको रोक ना पाते।
परिवर्तित यदि मृग ना होता,
तुलसी क़लम सींच ना पाते,
ना जाते लंका को रघुवर,
रावण घर घर सेंध लगाते।

परिवर्तन का कठिन दीर्घ पर,
सार बहुत ही कम होता है,
समय की सुइयाँ छिल ना जाएँ,
समय-समय से रंग ना जाये,
इस उद्देश्य जनित ज्वाला से ही,
ये जग परिवर्तन होता है।

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


यह कविता परिवर्तन के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो मन, समय और जीवन के विभिन्न पहलुओं में होता है। यह परिवर्तन के विभिन्न रूपों और उनसे जुड़े परिणामों को उजागर करता है।

यह कविता परिवर्तन के महत्व को दर्शाती है और बताती है कि परिवर्तन हर जगह मौजूद है।

इस कविता में परिवर्तन की क्या भूमिका है?

इस कविता में, परिवर्तन जीवन का एक सार्वभौमिक पहलू है, जो मन, समय, ऋतुओं और यहां तक कि ग्रहों को भी प्रभावित करता है। परिवर्तन एक ऐसी शक्ति है जो न केवल व्यक्तिगत विचारों और भावनाओं को बदलती है, बल्कि पूरी दुनिया को भी प्रभावित करती है। यह निरंतरता, विनाश और सृजन की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो जीवन के चक्र को आकार देता है।

कविता में 'यह जग परिवर्तन होता है' वाक्यांश का क्या अर्थ है?

यह वाक्यांश कविता के मुख्य विषय को सारांशित करता है: दुनिया में परिवर्तन हर जगह होता है। यह परिवर्तन की सार्वभौमिकता और सभी चीजों पर इसके प्रभाव को इंगित करता है। यह एक शक्तिशाली कथन है जो परिवर्तन की निरंतरता और महत्व पर जोर देता है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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क्या दान छिपाने की बात है ? एक समीक्षा - आरती

अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "

आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय, पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के निवारण के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।

आरती 


लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।


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वंदे मातरम् (हमारा राष्ट्रगीत- एक अनुस्मारक) - सौम्या गुप्ता

7 नवंबर 2025 को हमारे राष्ट्रगीत वंदे मातरम् ने 150 वर्ष पूरे किये। वंदे मातरम् अर्थात हम भारत माता की वंदना करते है। 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंद मठ में यह गीत लिखा जो उपन्यास के सन्यासियों द्वारा गया जाता था, फिर यह गीत भारतीय जन चेतना का गीत बन गया। इसे बच्चे से लेकर बूढ़े, यहां तक की इस गीत को गाते हुए कितने ही क्रांतिकारियों ने फांसी पर चढ़कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

यह गीत स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रेरणा था। हम अपने स्वधीनता के इतिहास को न बिसरा दे इसीलिए यह गीत 24 नवंबर 1950 को संविधान में जोड़ा गया। 

क्या हम सच में भारत मां की वंदना करते हैं? क्योंकि आज इस गीत को भी कुछ लोग सांप्रदायिकता (धार्मिकता का उन्मादी रूप) के नजरिये से विशेष वर्ग से जोड़कर देखते हैं। यह संकीर्ण नजरिया यह बताता है कि हम हमारी स्वाधीनता का सही सम्मान नहीं करते। हमें यह सोचने की जरूरत है कि क्या हम में सच में राष्ट्र प्रथम अर्थात स्वयं से भी पहले राष्ट्र का हित सोचने की भावना है?

आज इस गीत को हमें सच्चे अर्थों में समझने की जरूरत है और इसकी भावनाओं को जीने की भी जरूरत है।

सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम् की पंक्ति ने भारतीय मानस में चेतना का संचार किया। इस एक पंक्ति में भारत की समृद्धि, सौंदर्य और शक्ति एक साथ मूर्तिमान हो उठे।

 

थोड़ा लिखा ज्यादा समझना, हमें हमारे राष्ट्रगीत के एक-एक शब्द को समझकर उसे अपने व्यवहार, जीवन मूल्यों और दिनचर्या में शामिल करना है |

शुभकामनाएं 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |


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समझ 11.12.2025

आवारा श्वान मामले को संवेदना और गंभीरता से देखने की जरूरत है। आवारा श्वान और मवेशियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। हम अगर उन्हें सड़कों पर रहने की मंजूरी दें, तो वास्तव में उन्हें मौत की ओर ढकेलेंगे। अगर आवारा पशुओं से इंसानों को नुकसान होता है, तो खुद पशुओं की जिंदगी भी खतरे में पड़ती है। अत: बेहतर मानवीय बदलाव के लिए न्यायालय की सक्रियता जरूरी है, इसमें राज्यों को पूरा साथ देना चाहिए

- भारत का प्रजातंत्र एडवर्सेरियल डेमोक्रेसी (द्वंद्वात्मक या प्रतिस्पर्धी प्रजातंत्र ) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें लगातार जनमत तैयार कराने के लिए विचार सम्प्रेषण होता है।

- विज़न 2032 की सफलता का अर्थ केवल तकनीक का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक नीतियों और संसाधनों के पुनर्गठन से नागरिकों तक लाभ पहुँचाने की सरकार की प्रतिबद्धता है। लोकतांत्रिक जवाबदेही और समावेशन के मानदंडों को अक्षुण्ण रखना सरकार की सर्वोपरि जिम्मेदारी होती है। यदि विजन 2032 के सिद्धांतों पर नीति- निर्माता, तकनीकी संस्थान और नागरिक समाज एकजुट होकर कार्य करें, तो भारत न केवल डिजिटल पहचान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर विश्वसनीयता, पारदर्शिता और नैतिक शासन का उदाहरण भी स्थापित करेगा। यदि सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना सफल होती है, तो भारत का डिजिटल भविष्य ही नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों की भी रक्षा होगी।

- आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का पावन अवसर मना रहे हैं, यह केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का क्षण भी है। क्या हम उस भाव को जी पा रहे हैं, जिसके लिए असंख्य देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी ? क्या हम अपने जीवन में वही समर्पण, वही अनुशासन और वही मातृभूमि भक्ति स्थापित कर पाए हैं?

- प्रतिबद्ध व्यय का उच्च स्तर विकासात्मक कार्यों को करने की राज्य सरकारों की क्षमता को सीमित करता है।

 - एफआरबीएम समीक्षा समिति ने 2017 में अनुशंसा की थी कि राज्यों का कर्ज 20 फीसदी तक रहना चाहिए। इसके अलावा राज्य सरकारें सरकारी उपक्रमों द्वारा लिए गए ऋण की भी गारंटी देती हैं जो 2023-24 में जीएसडीपी का 4.2 फीसदी था। यह राज्यों की वित्तीय हालत के लिए एक जोखिम है। उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्य कुल आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर वित्तीय संकट में हैं और इन्हें अलग नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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दहेज प्रथा (पुनर्विचार) - लवकुश कुमार और सौम्या गुप्ता

दहेज प्रथा: यह एक ऐसी प्रथा है जिससे शायद ही किसी भारतीय को परिचित कराना पड़े। सदियों से चली आ रही इस प्रथा को कुप्रथा कहना ज्यादा सही होगा। इस शब्द को आप यदि न्याय संगत नहीं पाते हैं तो कोई और शब्द सुझाया जा सकता है।

इतिहास के बारे में कुछ बातें:- 

यह प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर पहले गायों को शादी के समय लड़की के साथ भेज दिया जाता था क्योंकि गाय का दूध लड़की ही दुहती थी इसीलिए लड़की के ससुराल जाने पर गाय उदास रहती थी, इसी कारण गायों को भी साथ भेज दिया जाता था। 

रामचरितमानस में भी राजा जनक द्वारा अपनी पुत्री को संपदा देने का प्रमाण है, राजा जनक व उनके भाइयों के कोई पुत्र भी नहीं था। अतः वह पूरा राज्य उन की सभी भाइयों की बेटियों का ही हुआ।

वर्तमान संदर्भ में आज लड़के वाले लड़की के घर आते है, बहू बना कर लड़की ले जाते हैं। एक तो वर पक्ष  किसी के द्वारा पहले पालन पोषण की गई लड़की को अपने घर लाता है और ऊपर से उसके पिता से पैसे की मांग करते हैं, उसके बाद भी न जाने कितने ही रस्मों के नाम पर दहेज, कपड़े, फर्नीचर पता नहीं क्या-क्या मांगते हैं!, जब बेटी के बच्चे होते हैं तब भी उनसे बहुत कुछ मांगते हैं सब कुछ  बेस्ट चाहिए होता है, यदि कुछ अच्छा नहीं हुआ तो आप मंडली बिठाकर चर्चा करना शुरू कर देते हैं।

 हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का होता है कि कैसे एक लड़की को दहेज के नाम पर ताना मारने वाली अक्सर सास और ननद होती हैं जिस सास ने पहले ही ये सब झेल रखा होता है, पता नहीं सास बनते ही उसकी सारी संवेदनशीलता कहां चली जाती है? वही सास जब बेटी को दहेज देती है तो मन ही मन सास और उसकी बेटी दोनों को ही बुरा लगता है। 

अब आते हैं इस कुप्रथा के दुष्प्रभावों पर 

आप दहेज से की डिमांड करते ही अपने घर में आने वाले सदस्य के मन में अपने प्रति अनादर का भाव भर देते हैं। भले ही‌ वर पक्ष यही क्यों ना कहे कि यह सब आप अपनी बेटी को ही तो दे रहे हैं, बेटी भी जानती है कि ससुराल में वह किस सामान का कितना प्रयोग करेगी? 

 यह समझना बहुत अचरज का काम है कि कैसे कोई किसी से इतना धन लेने के बाद भी अपनी अकड़ दिखा सकता है इससे दामाद अपने ससुराल वालों की नजरों में भी वह नहीं रहते जो उन्हें होना चाहिए, उन परिवारों को छोड़कर जहां इतनी संपत्ति है कि ये कुप्रथाएं कोई खास असर नहीं छोड़तीं।

अब यदि वर पक्ष चाहे कि वह नया सदस्य आपके घर को अपना माने, मन से सब की सेवा करें, सबसे घुल मिलकर रहे! लेकिन एक बार सोचिए,  दहेज मांग कर‌ क्या एक अच्छे इंसान की छवि बच पाई।

फिर दो तरह की परिस्थितियां आ सकती हैं कि एक तो पारिवारिक शांति के लिए मिलकर रहा जाए और दूसरी की प्रतिशोध की भावना से परायों जैसा व्यवहार!

जब बहू घर को अपना मानती है, घर में शांति रहती है परस्पर सम्मान की भावना होती है तो घर में निरंतर लक्ष्मी आती है और उस  शांति की संभावना अगर पहले ही भंग कर दी गई हो तो ?

इसका सबसे बड़ा परिणाम क्या होता है कि हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या होती है, जिंदगी भर बेटी को सही पोषण, शिक्षा, सम्मान कुछ नहीं मिलता क्योंकि आगे चलकर दहेज देना है तो वही पैसा दहेज के लिए बचत में लगाया जाने लगता है, माता पिता और भाई, तनाव में रहकर चिड़चिड़े हो जाते हैं सो अलग।

 मां-बाप बेटी के जन्म के बाद से ही तनाव में रहते हैं, जिस बच्ची के आने पर मां-बाप को खुश होना चाहिए था, वह दुखी हो जाते हैं। 

आश्चर्य की बात यह है कि लड़का जितनी अच्छी नौकरी करता है उतनी ही ज्यादा दहेज की मांग करता है !

आज जरूरत है कि बेटियों को इतना सक्षम बनाया जाए कि वह दहेज प्रथा का मुह तोड़ जवाब दे सके। लड़कों को भी इसके परिणाम समझने होंगे। यदि एक समय में लड़का और लड़की अपने हाथ में दहेज के प्रति विद्रोह की मसाल उठा ले तो इसको प्रथा का अंत हो सकता है। हमें लकीर का फकीर नहीं, कुछ अलग और सार्थक करने की जरूरत है।

आपने दहेज के चलते बहुओं की प्रताणना के बारे में सुना होगा और ये भी सुना होगा कि दहेज प्रथा अधिनियम का दुरूपयोग कर कई परिवार बर्बाद कर दिए गए, इसीलिए यह सोचने की जरूरत है कि अगर दहेज प्रथा जैसी शोषणकारी व्यवस्थाएं न होती तो यह अधिनियम भी न होता और न इसका दुरूपयोग!

दहेज प्रथा की जड़ में एक और बात है, सजातीय विवाह जिसके चलते सीमित विकल्प वधु पक्ष को दहेज देने को मजबूर करते हैं और तो और दहेज की सामर्थ्य न होने पर एक काबिल लड़की एक नाकाबिल इंसान के साथ बांध दी गई, इसके भी कई उदाहरण हैं।

जिन गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में कमाने खाने और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के भी उचित प्रबंध नहीं वो भी दहेज इकट्ठा करने के दबाव में बीमार भी होते हैं, चिड़चिड़े भी और कभी कभी ग़लत कामों में लिप्त भी।

इस प्रथा के दोषी वो भी हैं जो प्रतिष्ठा प्रदर्शन के चलते महंगी शादियों के ग़लत उदाहरण पेश करते हैं, हम सभी को पुनर्विचार करने की जरूरत है।

लवकुश कुमार एवं सौम्या गुप्ता 


लवकुश कुमार भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं,उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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महिला सशक्तिकरण- सौम्या गुप्ता

मेरी सीमित समझ में कुछ विश्लेषण और कुछ उपाय:

महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को निर्णय की शक्ति देना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, कहा  जाता है कि महिलाएँ अगर नौकरी करें, उन्हें पैसे मिले तो वो सशक्त होंगी लेकिन हो सकता है कि उनके पास यही निर्णय लेने की शक्ति न हो कि उन्हें ये पैसे खर्च कहाँ करने है तो ये सशक्तिकरण हुआ ही नहीं। अच्छी शिक्षा, अच्छा पोषण, समान अवसर जरूरी है।

क्या करे कि महिलाएं सशक्त हो?

जब बच्ची छोटी हो उसे पूरा पोषण युक्त भोजन दीजिए, लड़की होने के कारण उसे बासी या बेकार खाना मिलना उसके सशक्तिकरण में बाधक है।

बच्चियों को सही शिक्षा दिलवाएँ और वो ऊँचे से ऊँचा जो भी पढ़ना चाहे उसका यथासंभव प्रयत्न करें साथ ही आध्यात्मिक शिक्षा भी दें जिससे वह सीख सके कि वो देह नहीं चेतना है।

उसको कंप्यूटर तथा अन्य आधुनिक तकनीकी शिक्षा भी दिलाएँ, जिससे अगर जब भी उसे नौकरी करना हो वो उसके लिए योग्य हो।

एक सबसे अहम् पहलू है कि महिलाओं को अपनी फिटनेस का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है, खेल, व्यायाम जैसी गतिविधियां हों उनकी दिनचर्या में क्योंकि बचपन से ही उन्हें उछलने-कूदने- खेलने की आजादी उन्हें शारीरिक के साथ मानसिक रूप से भी मजबूत करेगी।

बचपन से ही उसके मन में ये न भरे कि वो पराई है, पराए घर जाना है। ऐसी भावनात्मक आघात वाली छोटी- छोटी बातें बेटियों को अंदर तक खत्म कर जाती हैं और उनका जीवन में कुछ बड़ा सोचने और करने का उत्साह कम या खत्म हो जाता है।

२०२० में इतिहास के एक सर्वेक्षण में सामने आया था कि महिलाएँ भी पहले शिकार पर पुरुषों के साथ जाती थी। अभी हाल ही में भी एक ऐसा ही सर्वेक्षण सामने आया था। ये सर्वेक्षण बताते है कि महिलाओं के दिमाग में हमने अगर ये कमजोरी का कीड़ा न बिठाया होता तो वो आज अधिकांश क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर होतीं।

आदर्श स्थिति यह है कि जैसे पुरुष सशक्तिकरण जैसी कोई स्थिति नहीं होती वैसे ही महिला सशक्तिकरण जैसी कोई बात ही न करनी पड़े। पर यह एक आदर्श स्थिति है जिसे पाने में शायद दशकों लगे पर ये शुरुआत तो की जा सकती है और ये शुरुआत हमें ही करनी होगी।

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, 

उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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अंधविश्वास- एक समीक्षा(सौम्या गुप्ता)

लोग अंधविश्वास में क्यों फंसते हैं?

लोकल न्यूजपेपर में पढ़ते हुए कि एक पिता ने बेटे की चाह में बेटी की बलि दे दी, इसे पढ़ते हुए मन दुःख के साथ-साथ आश्चर्य से भी भर गया, ख्याल आया कि कैसे अशिक्षित और असंवेदनशील लोग है!

इस अंधविश्वास का कारण क्या हो सकता है?

एक कारण जो मैं समझ पा रही हूं, हो सकता है कि जब हम दुखी होते हैं, तब हमारा मन आशा की किरण ढूंढता हैं। उस समय किसी को वो एक किरण मिल जाती है या एक भ्रम कि उस समय कुछ लोगों को उम्मीद नहीं दिखती है तो वो बाबाओं के पास जाते हैं,  दरअसल होता ये है, हम उस घोर दुःख की घड़ी में जो हमारे साथ खड़ा होता है उसे हम अपना भगवान समझ लेते हैं और ये वक्त की बात है कि उस समय हमें कैसा इंसान मिलता है,  उसी इंसान का हम अनुसरण करते है। इस विश्वास के साथ की हमारी दिक्कतें दूर हो जायेंगी लेकिन अगर ये विश्वास तर्कहीन हो और हम संवेदना और करूणा भूलकर केवल स्वार्थ के वशीभूत हो जायें तो यही विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है, एक सात्विक इंसान का साथ हमें प्रेममयी बनाता है जबकि एक पाशविक प्रवृत्ति के स्वकेंद्रित इंसान का साथ हमें स्वार्थी और संवेदनाहीन बना देता है।

इसीलिए जरूरी है कि ये अज्ञान खत्म हो लेकिन उसमें समय लगेगा। लेकिन जब भी आप किसी संकट से गुजर रहे हों उस वक्त या तो आप खुद की अंतरात्मा पर यकीन करे या उस समय भी आप सही इंसान इस आधार पर चुने कि क्या वह अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों का अहित करने की बात तो नहीं कर रहा, उसके जीवन में सच कितना है, इस तरह एक चुनाव आपकी जिंदगी बदल सकता है सकारात्मक या नकारात्मक आपके चुनाव पर निर्भर करता है।

दिक्कतें आती जाती रहती हैं, विकल्प मौजूद रहते हैं, दिक्कत के समय में सच्चे इंसान को ही चुनें और दिक्कतों के ऊपर इंसानियत को रखें, खुद से पहले समष्टि को रखें, अपने हित के लिए कोई ग़लत उदाहरण पेश न करें।

आपकी राय क्या है जरूर अवगत करायें।

शुभकामनाएं 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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उम्र ( लघुकथा ) - लवकुश कुमार

जीवन में बहुत से संयोग होते हैं, सुखद भी और दुखद भी, ऐसा ही एक संयोग मेरे साथ हुआ। सड़क दुर्घटना में मेरे बाएं हाथ की कालर बोन टूट गयी,हालत ये हुई कि, कुछ देर लेटना, कुछ देर बैठना। ऐसे ही एक दिन पत्नी मुझे बिस्तर पर लिटाकर गई और मेरा फोन चार्जिंग पर मुझसे कुछ दूरी पर लगा हुआ था, फोन की घण्टी बजती है। पत्नी मेरे बेटे को मुझे मोबाइल देने के लिए भेजती है पर जब तक बेटा आता है, फोन कट जाता है। इसीलिए बेटा मोबाइल मेरे पास रखकर चल देता है, मैं अपना मोबाइल उठाने की कोशिश में अपना हांथ बेड पर इधर उधर रख रहा था पर दोनों कंधों में क्लैविकल ब्रेस बंधा होने के चलते मेरे हाथ की गति ठीक से नहीं हो पा रही थी, मैं बस कोशिश कर रहा था, इतने में खेलने के लिए वापस जाते हुए मेरे बेटे ने अपने पिता को देख, दिक्कत को समझ लिया, वह आता है और मोबाइल को बेड से उठाकर मेरे हाथ में रखकर फिर खेलने चला जाता है। मैं अपने 6 साल के बेटे की संवेदनशीलता, तत्परता को देख मुग्ध हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि क्या संवेदनएं हममें जन्म से होती हैं शायद जरूरत है तो सही माहौल और प्रोत्साहन देकर इन्हें बनाए रखने की, शायद बच्चों की संवेदनाओं को सामाजिक व्यवहार ही भ्रष्ट कर देता है। सच ही कहा जाता है कि अपने बच्चे को कुछ भी बड़ा बनाने से पहले उसे नेक इंसान बनाएं। वह समाज के साथ साथ आपके भी काम आएगा, हां अगर आपने उसे मतलबी बना दिया तो हो सकता है कि जरूरत निकल जाने पर वो आपसे भी परायों की तरह व्यवहार करें।

लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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