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एक चोर, चोरी तब ही छोड़ता है जब वो स्वीकार कर लें कि चोरी एक ग़लत कृत्य है।

ज्ञान अगर एक ही जगह रह जाए
तो ये ज्ञान के लिए भी खतरा है और इससे शोषण की संभावना बढ़ जाती है।
ज्ञान का प्रचार और प्रसार जितने ही ज्यादा लोगों में हो सके उतना ही उन्नति होगी समाज की।
हम दुष्परिणाम देख चुके हैं ज्ञान को कुछ लोगों तक ही सीमित रखने का।
जिनको ये डर रहता है की ज्ञान फैलने से प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी उनसे मै ये कहना चाहता हूँ की प्रतिस्पर्धा जरुर बढ़ जाएगी लेकिन उससे एक चीज़ और बेहतर होगी की हमारे आस पास हर इंसान के काम में उत्कृष्टता बढ़ेगी और जीवन की तकलीफ कम होगी क्योंकि उत्कृष्टता आनंद को और निश्चिन्तता को सुनिश्चित करती है |
आसान भाषा में कहें तो, फिर एक कनिष्ठ से कनिष्ठ कार्मिक भी ज्ञानवान और इतना समझदार होगा और कि उसके द्वारा किये गये कार्यों में गलतियों की संभावना कम से कम रहेगी जो आगे चलकर हमारे मन को निश्चिंतता देगी और काम में उत्कृष्टता का उद्देश्य देकर हमारे समाज को और बेहतर बनाएगी |
किसी भी देश की यूनिवर्सिटीज़ अच्छी नहीं हो सकती अगर उस देश की संस्कृति, रुढिग्रस्त और रोगग्रस्त हो।
कैंपस के अंदर महानता तब ही विकसित होगी
जब कैंपस के बाहर या तो महान लोग हों या
कम से कम महानता के इच्छुक हों।
आपकी यूनिवर्सिटीज़ अगर top notch नहीं तो
आपकी अर्थव्यवस्था भी stagnant या dependent रहेगी।
R&D और innovation का दारोमदार यूनिवर्सिटीज पर ही है।
किसी विश्वविद्यालय में मिलने वाली सुविधाएं अलग हैं और वहां जाने का मुख्य प्रयोजन अलग, जोकि कभी भूला नहीं जाना चाहिए, सुविधाएँ सहायक हो सकती हैं , माहौल को बेहतर करने में और उत्पादकता बढ़ाने में लेकिन वहां जाने का उद्देश्य अध्ययन, विमर्श और शोध हो, न की सुविधाएँ लेना|
-लवकुश कुमार
नोट- कुछ अंश आचार्य प्रशांत के वीडियो लेक्चर से और बाकि मेरा अवलोकन है |