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जीवन में बहुत कुछ संयोग से मिलता है जिसका श्रेय आप नहीं ले सकते और बहुत कुछ तय प्रक्रियाओं से गुजरकर |
ऐसा हो सकता है कि किसी के जीवन की एक चूक उसे कुछ बहुत महत्व का पाने से वंचित कर दे, ऐसी अवस्था में ऐसे इंसान के द्वारा अमूमन दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं एक तो आगे बढ़कर वर्तमान में मौजूद विकल्पों पर विचार और अपनी परिस्थिति और प्राथमिकताओं के अनुसार विकल्प का चयन और दूसरा कि अपना जीवन अफ़सोस और दोषारोपण में बिताना, दूसरी तरह की प्रतिक्रिया बहुत हानिकारक है क्योंकि इस स्थिति में इंसान भूतकाल की याद में वर्तमान की अन्नंत बेहतर संभावनाओ पर ध्यान नहीं दे पाता और फिर से बार बार चूकता रहता है |
जीवन आत्मनिर्भरता, आज़ादी और गरिमा के साथ जीने और लोकसेवा में समर्पण से धन्य होता है फिर क्या फर्क पड़ता है की आपको अमुक क्षण में आपकी मनचाही वस्तु मिली या नहीं बल्कि हमारा ध्यान तो चल रहे और आने वाले हर पल की असीम संभावनाओं को तलाशने और उन्हें जरुरत अनुसार अंगीकार कर आत्मनिर्भरता, आज़ादी, गरिमा और लोकसेवा को समर्पित जीवन जीने पर होना चाहिए |
अगर हम वर्तमान की संभावनाओ के बजाय अपना ध्यान भूतकाल के नुकसान पर लगाये रखेंगे तो हो सकता है की उस पुराने नुकसान/चूक के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार इंसान (वो इंसान आप स्वयं भी हो सकते हैं ) को कोसते रहें और अपने जीवन को कडवाहट से भर लें |
हमें ये याद रखना होगा की जिस पेड़ की छाया हम आज ले रहे हैं, बहुत संभावना है की वो पेड़ किसी और ने लगाया हो, एक बार आप भी समीक्षा करें की क्या आप कोई ऐसा काम कर रहें हैं जिसका लाभ ऐसे लोगों को मिल रहा है जिनसे आपका कोई रिश्ता नहीं, अगर नहीं तो मौजूद संसाधन, समय, ताकत और धन का एक हिस्सा इस काम को भी दें, जीवन में उत्कृष्टता आ जाएगी |
होली-होली-होली!
अलस कमलिनी ने कलरव सुन उन्मद अँखियाँ खोली,
मल दी ऊषा ने अम्बर में दिन के मुख पर रोली।
होली-होली-होली!
रागी फूलों ने पराग से भरली अपनी झोली,
और ओस ने केसर उनके स्फुट-सम्पुट में घोली।
होली-होली-होली!
ऋतुने रवि-शशि के पलड़ों पर तुल्य प्रकृति निज तोली
सिहर उठी सहसा क्यों मेरी भुवन-भावना भोली?
होली-होली-होली!
गूँज उठी खिलती कलियों पर उड़ अलियों की टोली,
प्रिय की श्वास-सुरभि दक्षिण से आती है अनमोली।
होली-होली-होली!
फागोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं
डॉ अनिल वर्मा
डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
इनके द्वारा शिक्षण और साहित्य के अध्ययन/अध्यापन का अनुभव एक बेहतर समाज के लिए उपयोगी है |
इस वेबसाइट पर लेखक द्वारा व्यक्त विचार लेखक/कवि के निजी विचार हैं और लेखों पर प्रतिक्रियाएं, फीडबैक फॉर्म के जरिये दी जा सकती हैं|
प्रत्यास्थता की सीमा में, प्रतिबल विकृति के समानुपातिक होता है।
समानुपातिक गुणांक को प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं।
रैखिक विकृति के लिए
प्रतिबल = Y × विकृति
कुछ छात्रों/छात्राओं को भ्रम हो सकता है कि कहीं ये सूत्र
विकृति = Y × प्रतिबल तो नहीं
उनको ये याद रखना होगा कि प्रतिबल, दाब और प्रत्यास्थता गुणांक के मात्रक समान होते हैं और विकृति मात्रक विहीन होती है इसलिए पहला सूत्र ही सही है ताकि प्रतिबल और प्रत्यास्थता गुणांक का अनुपात एक मात्रक विहीन राशि हो सके।
Maximum possible kinetic energy of emitted electron is nothing but the energy remainder when energy consumed in combating the work function is substracted from total energy of incident photon.
प्र- आयकर और अन्य करों मे कटौती का मूल आशय हो सकता है ?
उ- उद्यम को बढ़ावा देना ताकि व्यापार और रोजगार बढ़ सके |
प्र- संगठित क्षेत्र मे सृजित नौकरियों का डाटा मिल सकता है ?
उ- EPF, ESIC और श्रम विभाग से |
प्र- सरकारी व्यय का एक प्रमुख हिस्सा ?
उ- पूंजीगत निवेश
प्र- पूंजीगत निवेश पर टिप्पणी :
उ- इस मद मे खर्च होने वाला हर एक रुपया करीब 2.5 रुपया देश की अर्थव्यवस्था मे जोड़ता है |
संदर्भ- दैनिक भाष्कर की 20-02-25 की संपादकीय पर आधारित |
प्र- उच्चकुशल पेशेवर जब अमेरिका से भारत लौटते हैं तो ?
उ- अपने साथ बेशकीमती विशेज्ञता, बेहतरीन नेटवर्क और अच्छी ख़ासी धनराशि लेकर लौटते हैं |
प्र- रिर्वस ब्रेन ड्रेन से भारत को क्या फायदा है ?
उ- यह भारत की इनोवेशन इकॉनमी को पोषित कर रहा है |
प्र- जीसीसी क्या है ?
उ- वैश्विक क्षमता केंद्र - ग्लोबल कैपसिटी सेंटर का कार्य जटिल इंजीनियरिंग, आर एंड डी तथा अत्याधुनिक तकनीकी इनोवेशन करना है |
प्र- विकसित राष्ट्र के कुछ मानदंड ?
उ- मोटे तौर पर प्रति व्यति आय, मानव विकास सूचकांक और अन्य मानदंड |
संदर्भ- दैनिक भाष्कर 20-02-25 में मिनहाज मर्चेन्ट जी के लेख पर आधारित |
आजकल देखने मे आ रहा है की टीवी shows और अन्य माध्यमों पर अश्लीलता और भद्दे कथ्य बढ़ रहे हैं !
क्या हो सकता है इसका कारण ?
कहीं इसका कारण ये तो नहीं कि लोगों के पास बात करने के लिए बड़े मुद्दे हैं ही नहीं !, शायद आप इस पर सोंचना पसंद करें ?
बनिस्बत मुद्दे तो हैं - क्लाइमेट चेंज, अवसाद, उप्भोक्तावाद इत्यादि |
आस पास देखिये कि क्या साहित्य अध्ययन कि तरफ रुझान पहले जैसा है या घट रहा है ?
क्या लोग जीवन और स्वयं को समझने से ज्यादा इस बात को महत्व दे रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा पैसा कैसे इकट्ठा करें ताकि भोगना जारी रहे ?
ये कुछ सवाल हैं |
इस लेख का संदर्भ एक संदेश है जो मुझे आचार्य प्रशांत जी की संस्था से प्राप्त हुआ, पहले संदेश पढ़िए फिर मेरी टिप्पणी।
संदेश -------
🔥 हम एक खोज पर निकले, और देखिए हमें क्या मिला! 🔥
हमने लोगों से पूछा, “क्या आपकी ज़िंदगी खुशहाल है?”
लोग बोले, “नहीं”
हमने कहा, “तो क्या अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने का फैसला आपने खुद सोच समझ कर लिया?”
लोग बोले, “नहीं”
हमने पूछा, “फिर ये हुआ कैसे?”
लोग बोले, “हमें तो लग रहा था सब ठीक ही चल रहा है। खुद को होशियार मानते थे।पता ही नहीं चला ज़िन्दगी हाथों से कब फिसल गई”
कोई अपनी ज़िंदगी को बर्बाद करने का फैसला जानबूझकर नहीं लेता।
कोई भी खुद नहीं कहता—_“चलो, ऐसा कुछ करते हैं कि आगे उलझन, तनाव, अकेलापन और पछतावा ही बचे!”__
लेकिन फिर भी यही होता है :
❌ 25 की उम्र में— “मैं इतना उलझा क्यों हूँ?”
जवाब आप 5 साल पीछे छोड़ आए है,
जब 20 की उम्र में गीता को टाल दिया था।
❌ 30 में तनाव, असंतोष और बेचैनी घेरेगी— “मैंने सब कुछ किया, फिर भी चैन क्यों नहीं?”
क्योंकि 25 में जो मार्गदर्शन मिल सकता था,
उसे “अभी नहीं, बाद में” कहकर छोड़ दिया था।
❌ 40 की उम्र में देखेंगे कि रिश्ते खोखले हैं, दोस्त दूर हो चुके हैं, और दुनिया व्यस्त हो गई है।
पर यह अकेलापन 40 में नहीं आया,
यह उसी दिन आ गया था जब आप गीता को छोड़ कर अकेले निकल पड़े थे।
❌ 50 की उम्र में सोचेंगे— “क्या सच में ज़िंदगी का कोई मतलब है?”
क्योंकि जीवन की दिशा तय करने वाले सत्रों से गुज़रने की हिम्मत ही नहीं जुटाई।
❌ 60 की उम्र में पछतावा घेर लेगा— “काश, मैंने सच को टाला न होता।”
लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी।
आपको आज लगता है कि “मैं इतना भी मूर्ख नहीं कि खुद को ऐसी स्थिति में डाल दूँ!”
लेकिन जो गीता सत्रों से पीछे छूट चुके हैं, उन्हें भी यही लगता था।
वो सोचते थे कि “मैं कुछ दिन बाद रजिस्टर कर लूँगा!”
फिर वो दिन कभी नहीं आया।
वो सोचते थे कि “मेरी प्राथमिकताएँ अभी कुछ और हैं!”
फिर वो प्राथमिकताएँ उन्हें ऐसी जगह ले गईं जहाँ से वापसी का रास्ता ही नहीं बचा।
वे आज भी गीता को चाहते हैं, लेकिन अब उनके भीतर की आग ठंडी पड़ चुकी है। अब जीवन के बंधन इतने मजबूत हो चुके हैं कि उन्हें तोड़ना नामुमकिन सा लगता है।
पहला कदम उठाइए, इससे पहले कि माया आपको पूरी तरह पकड़ ले!
~ PrashantAdvait Foundation, on Gita Community Feed.
अब मेरी टिप्पणी -----------
ये उनके लिए है जिन्हें लगता है कि अध्यात्म सबसे आखिरी काम है।
लेकिन मुझे लगता है कि १५ की उम्र से ही इस जीवन में अध्यात्मिक समझ को लाना चाहिए।
नहीं तो एक समय के बाद इंसान को यही लगता है कि *सब कुछ सही चल रहा था पता नहीं कहां लाइन कट गयी*
वास्तव में जैसे शरीर अंदर से अस्वस्थ होने पर पहले छोटे छोटे लक्षण प्रकट करता है और हम नजरंदाज कर देते हैं लेकिन जब समस्या गंभीर हो जाती है तब गंभीर लक्षण प्रकट होते हैं, तब हमें ये लगता है कि ये अचानक कैसे, सबकुछ तो लगभग ठीक चल रहा था!
मैंने सुव्यवस्थित रूप से पहली बार ग्यारहवीं में पढ़ी अध्यात्म की पुस्तक, और इतना जाना कि *जीवन में मेहनत और त्याग का फल कैसा होगा ये "जीवन के केंद्र से निर्धारित होता है, जिसके इर्द गिर्द" हम काम करते हैं।*
आप सहमत हों तो युवाओं में इसे आगे बढ़ा सकते हैं, दिन का एक घंटा अध्यात्मिक साहित्य को देकर युवा और बेहतर स्पष्टता से अपने कैरियर के लिए काम कर पायेंगे, अपने व्यवसाय को और बेहतर तरीके से चला पाएंगे ऐसा मेरा विश्वास है कि स्वयं लागू किया।
ग्यारहवीं से लेकर आज तक तकनीकी शिक्षा के बावजूद नियमित रूप से अध्यात्मिक साहित्य/बोध साहित्य/उत्कृष्ट जीवन साहित्य/बड़े लोगों के जीवन और अनुभव के बारे में पढने को दिनचर्या में उचित स्थान दिया।
शुभकामनाएं 💐
१०० से अधिक पुस्तकों लेखक, दिल के बेहतरीन इंसान, पूर्व राष्ट्रपति स्व - शंकर दयाल शर्मा जी के निजी सचिव रहे, रिटायर्ड आईएएस आदरणीय डॉ विजय अग्रवाल सर का साक्षात्कार नीचे दिए लिंक से जरूर देखें।
https://youtu.be/iTJrhYbM9yE?si=h7PhA9EEZAlliR8U 👈💐
शुभकामनाएं