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बच्चों के शिक्षकों से समय समय पर मिलते रहे और आपकी संतान पढाई और अन्य गतिविधियों में कैसा प्रदर्शन कर रही इसकी जानकारी लें, आपकी जागरूकता शिक्षकों को और ज्यादा जिम्मेदारी का अहसास करवाएंगी |
इसमें ये जो “लिखे “ इस शब्द को अगर सार्थक करना है तो मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों को पढने के साथ अपने विचारों को और समझ को लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे होगा क्या ? इससे दो फायदे हो सकते हैं पहला की बच्चे अपनी बात को रखने में निपुण होंगे दूसरा ये कि समाज में कई तरह के लेखक हैं कोई अपने लेखन कौशल से कोई बात को प्रचारित करता है या प्रोत्साहित करता है तो कोई लेखक किसी बात को, तो क्यों ने हम भी अपनी बात को एक बड़े जन समूह या एक बड़े पाठक वर्ग के साथ साझा करें और उन बातों को सामने रखें जो जरुरी तो हैं लेकिन उन्हें किसी कारणवश उतना महत्व नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए, साथ ही ऐसा हो सकता है कि मौजूदा लेखक वर्ग अपनी लेखनी में हमारे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को उचित स्थान न दे रहे हों उस स्थिति में हम उस कमी को पूरा कर सकते हैं|
बच्चों का रुझान और जरुरतें , एक प्रयास बेहतर बदलाव और समृद्धि के लिए
बच्चों को अगर भाग्यवादी नहीं बल्कि तर्कवादी बनाना है तो उन्हें अध्ययन के लिए प्रेरित करना होगा, उन्हें बताना होगा की अध्ययन से वो बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कार्य-कारण सिद्धांत को और समझ पाएंगे की दुनिया में घट रही घटनाओं के पीछे क्या तर्क है, अलग अलग जगहों और अलग-अलग पेशों के लोगों का व्यवहार, प्राथमिकतायें अलग अलग क्यों होती है, क्यों एक काम एक इंसान के लिए सही और दूसरे के लिए गलत हो सकता है, क्यों कोई बात किसी के लिए छोटी और किसी के लिए बड़ी हो सकती है; इस तरह वो खुद को और दुनिया को बेहतर समझ पाएंगे और स्वयं के लिए क्या बेहतर है इस बात को समझकर लोगों के साथ ताल मेल बिठाकर अच्छे से आगे बढ़ पाएंगे|
और साथ ही एक आत्मनिर्भर तथा गरिमामय जीवन के लिए पैसा कमाने के लिए सही रास्ता अपनाएंगे और साथ ही उसे सही और उचित मदों पर ही खर्च करने की दृष्टि विकसित कर पाएंगे |
“अध्ययन की उपयोगिता समझ आ गयी तो रुझान आ ही जाना है |”
“तर्कवादी इंसान किस्मत के सहारे नहीं बैठता है बल्कि वो सही तरीके से खुद के लिए जो बेहतर उसे पाने के लिए उद्दयम करता है |”
“जिसकी इच्छाएं सीमित हों और जो तर्कवादी हो, कार्य कारण के सिद्धांत में विश्वास रखता है उसके द्वारा अंधविश्वास की शरण एक दुर्लभ बात हो जाती है |”
स्रोत - यूपीएससी सिविल सेवा ( मुख्य परीक्षा निबंध के विषय )
अगर किसी इंसान की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे बस अपनी सुविधा असुविधा दिखती है, दूसरों की उसे कोई परवाह नहीं है तो उसकी यह प्रकृति उसके एक-एक कार्य में दिखाई देंगी।
जैसे अगर वो किसी सड़क को रिपेयर करेगा तो बजडी वहीं छोड़ देगा, उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं कि कोई वाहन उस पर फिसलकर गिर सकता है।
जैसे अगर उसके बालू खनन के डंपर चल रहे हैं तो वो ड्राइवर को पैसे नहीं देगा, उस डंपर को ढकने के लिए भले ही बालू उड़कर सड़क को गंदा करे या किसी की आंखों और फेफड़ों में जाए ।
अगर वो किसी सड़क के डिवाइडर बनाएगा तो उसमें पाइप और सरिया ऐसे ही छोड़ देगा भले ही किसी राहगीर के गिरते ही उसके सीने में घुस जाए।
सड़क ऐसी बनाएगा कि एक ही बरसात में ही उसमें गड्ढे बन जायें
स्वाद बढ़ाने के लिए मसालों में ऐसा रसायन मिला देगा कि उससे लोगों को कैंसर तक हो जाए।
एक दृष्टि डालते हैं खुद पर जब हमें कोई दिखता है जो लोगों के हित अहित को लेकर चिन्तित हो तो उससे हम क्या कहते हैं?
कि संयत होकर सोचो और बीच का रास्ता निकालो, जनहित को ऊपर रखो या फिर
हम कहते हैं कि " अपना देखो दूसरों के बारे में इतना क्यों सोचना! "
हमारा जवाब क्या होगा इससे ही निर्धारित होता है कि समाज में किस तरह के लोगों की संख्या ज्यादा होगी।
विरोधाभास देखिए कि जो इंसान खुद दूसरों की सुविधा - असुविधा का ध्यान नहीं रखता वो भी दूसरों से अपेक्षा रखता है कि लोग उसकी सुविधा असुविधा का ध्यान रखें।
आप किस तरह का उदाहरण बनना चाहतें हैं?
किन लोगों में खुद की गिनती करवाना चाहते हैं ?
उनमें जो जो दूसरों की चिंता करते हैं और दिमाग पर जोर देकर रास्ता निकालते हैं या उनमें जो बस अपना आराम और अपना वित्तीय फायदा नुकसान देखते हैं और दूसरों की परवाह नहीं करते ?
जरूर विचार करिए और दूसरों से भी चर्चा करिए, समय निकालकर करिए |
स्रोत - यूपीएससी सिविल सेवा मुख्य परीक्षा- निबंध के विषय
स्रोत - यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा निबंध के विषय
लोगों का आंकलन करते वक्त उनका व्यवहार नहीं उनके कार्य की गुणवत्ता, जिम्मेदारी लेनी की इच्छा और जवाबदेही का भाव देखिए।
जो इंसान कार्य के प्रति समर्पित है, संभावना है कि डेडलाइन के चलते या ज्यादा काम के चलते वो कभी-कभी अपने व्यवहार को संयत न रख पाए वहीं जो लोग कामचोर प्रवृत्ति के होते हैं, उनके लिए अपने व्यवहार को संयत रखना अपेक्षाकृत आसान होता है।
इसीलिए ये न देखिए कि कौन आपको हर त्योहार बधाई संदेश भेज रहा है या आपकी आत्मप्रशंसा की बातों में हां में हां मिला रहा है, बल्कि ये देखिए कि कौन अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को अच्छे से पूरा कर रहा।
देश और समाज में समृद्धि और संपन्नता गुणवत्तापूर्ण और जिम्मेदारी के साथ किए गए कार्यों से आती है नकि बधाई संदेश फारवर्ड करने से।
-लवकुश कुमार