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और अनुपमा, कैसी हो ? साधना ने अपनी सहेली के हास्टल के कमरे में घुसते ही पूछा।
ठीक हूं यार, तू बता कैसी है और कैसे हैं मेरे होने वाले जीजा जी, साधना का हांथ पकड़ते हुए आंखों में एक चमक और चेहरे पर ठिठोली का भाव लाते हुए, अनुपमा ने भी सवाल दाग दिया।
वो भी ठीक हैं ( चेहरे पर लालिमा और मुस्कुराहट के साथ ), उनका तबादला बनारस हो गया है और आज ही वो बिजनौर के कार्यालय से रिलीव भी हो गए हैं, साधना ने जवाब दिया, पापा कह रहे थे कि मेरे फाइनल सेमेस्टर के एग्जाम के तुरंत बाद सगाई और नवंबर में शादी!
अब जल्द ही मेरा अकेलापन दूर हो जाएगा, साधना खिलखिलाते हुए बोली।
नहीं प्यारी, अकेलापन दूर नहीं होगा बस दब जायेगा, अनुपमा ने मुस्कुराते हुए आध्यात्मिक ज्ञान का साझा किया |
अकेलापन दूर होता है जब हम किसी बड़े काम में लगते हैं, ऐसा काम जो हमें हमारी उच्चतम संभावनाओं तक ले जाए, अनुपमा ने आगे समझाया |
तो तू कब ढूंढ रही है कोई जो तुझे तेरी उच्चतम संभावनाओं तक ले जाए, साधना ने कुछ खीझकर कहा।
प्रतीक्षा में हूं कि कब कोई मिलेगा ऐसा, जल्दबाजी में मैं किसी ऐसी गाड़ी में नहीं बैठना चाहती जिसमें मुझे खुद ही धक्का लगाना पड़े, इससे बेहतर है कि मैं पैदल ही चलती रहूं, अनुपमा ने गहरी सांस भरते हुए कहा।
- लवकुश कुमार
इस तरह की वेबसाइट पहले ही कई हैं जिसमे अपना अनुभव या ज्ञान साझा करते हैं लोग, उसी तरह यह भी एक वेबसाइट है बस अंतर इस बात का है कि इंसान के अनुभवों मे जो कुछ अंतर होता है वो होता है अलग-अलग परिस्थितियों के चलते, इसीलिए यहाँ मै अपने तरीके से अपने अनुभव व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ जो उनके लिए तो उपयोगी होंगे ही जिन्हे वही माहौल मिल रहा जो मुझे मिल रहा और उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो अन्य माहौल से हैं और अपनी समझ को और समावेशी करना चाहते हैं |
जैसे एक ही बात को कहने के तरीके अलग अलग होते हैं, कोई कविता, कोई शायरी, कोई व्यंग तो कोई सपाट लेख लिखकर व्यक्त करता है अपने विचार और संदेश वैसे ही पाठक भी कई तरह के होते हैं कोई कविता तो कोई कोई लेख या कोई और किसी अन्य साहित्यिक विधा मे बात सुनना/पढ़ना पसंद करता/करती है, मुझे विश्वास है कुछ पाठक/श्रोता ऐसे भी होंगे जिन्हे मेरी लेखन शैली प्रभावित करेगी और मेरी बात और संदेश/अनुभव को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ सकेंगे, जिन पाठकों को कोई बात अजीब लगे, निसंकोच मुझे लिख भेजे ( वेबसाइट पर दिये कांटैक्ट फॉर्म से ) |
एक समय था जब मेरे युवा और संवेदनशील मन में समाज और स्वयं को लेकर बहुत सवाल थे और मेरे समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन बातों पर मंथन पर खर्च होता था, लोगों और स्वयं के मन को समझने के लिए मै लोगों से बात करता था, कभी लोग न मिलें तो किताबें पढ़ता था और कभी ये ही न पता हो कि इस मामले के लिए कौन सी पुस्तक पढ़नी है तो ऐसे ही स्वयं सोचना, विचारना और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करता था।
कुछ किताबों को पढ़कर मानो ऐसा लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गयी हों, मेरा भी ऐसा ही कुछ प्रयास है की कोई दुविधा और बेचैनी मे फंसा हुआ इंसान मेरे लेख, मेरे अनुभव या संदेश पढे और उसे लगे की अरे ये तो लग रहा कि उसके लिए ही लिखा हुआ लेख है|
मेरा प्रयास है कि जो युवा एक सीधा, सरल और समृद्ध जीवन जीना चाहते हैं मै इस मंच से उनकी जिज्ञासाओं को हल कर पाऊँ, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा यह तो आप पाठक ही निर्धारित कर पाएंगे, प्रयास जारी रहेगा |
खासकर वो लोग जो सीधा और सरल जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें इधर उधर से सुनने को मिलता है कि दुनिया में सीधा और सरल रहकर जीना मुश्किल है और लोग तमाम तरह के झूठ बोलने को उकसाते हैं और तरह तरह के दिखावे करने को बोलते हैं।
"जबकि बात केवल इतनी सी है कि सीधा और सरल होने के साथ हमें समझदार होना है और काबिल ( कौशल युक्त, सजग और जागरूक ) भी ताकि स्पष्टता रहे और हम अपनी क्षमताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर बन सकें |"
एक बात स्पष्ट रूप से समझनी होगी कि आप अगर बात - बात पर झूठ बोलते हैं तो आपके लिए सच असहनीय हो जाता है और नतीजतन सच्चे लोग आपसे दूर होने लगते हैं और आप झूठे लोगों से घिर जाते हैं।
जो इंसान स्वयं ही झूठे बहाने बनाता हो उसके लिए झूठे और सच्चे इंसान में फर्क करना मुश्किल हो जाता है और किसी पर यकीन करना भी, या फिर कोई लंबे अरसे तक झूठे लोगों के बीच रहे जो बार-बार वादा करके तोड़ते हों या फिर कहते कुछ हों और करते कुछ इस तरह की परिस्थितियों का भुक्तभोगी इंसान भी किसी पर जल्द यकीन नहीं कर पाता |
"अगर इंसान जीवन में एक सही उद्देश्य, सही काम को पकड़ ले तो उसे बाहरी परिस्थितियां और लोगों की बातें उस सीमा तक प्रभावित नहीं कर पाती कि वह अशांत हो जाए |"
क्रोध आपकी मजबूरी और आपके ऊपर दबाव (अपेक्षाओं का, डर का या आकांक्षाओं का ) को व्यक्त करने कि प्रक्रिया है, आपका जीवन जितना दबावमुक्त होगा और आप जितना खुलकर अपना पक्ष रखते होंगे उतना ही आपके अंदर क्रोध कम पनपता है, क्रोध अंदर ही होता है उसे भड़काने का काम करती हैं बाहर कि घटनाएँ, जरूरत है स्वयं पर नज़र रखने की|
दुनिया से धोखा तब मिलता है जब हम या तो डर या लालचवश या फिर अशांत अवस्था मे कोई कदम उठाते हैं या फिर कोई चुनाव ( पसंद/नापसंद ) करते हैं, ज्ञान और स्पष्टता के माध्यम से हम डर, लालच और मोह से मुक्त हो सकते हैं और अभ्यास से खुद को संयत रख सकते हैं ताकि अशांति की अवस्थाएँ कम हों और हम ठगे जाने से बच सकें |
ध्यान रखें की जब हमारे निर्णयों के केंद्र मे डर या लालच के बजाय असली जरूरत होगी तो ठगे जाने की संभावना कम होगी |
ये सब कुछ हमे सीखने, जानने को मिलता है आत्मवलोकन, साहित्य और आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन से, जिसके महत्व को रेखांकित करके यहाँ अध्ययन के लिए लोगों को प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है |
"हमारी समझ और स्पष्टता के साथ हमारे आदर्श, चुनाव और पसंद-नापसंद ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं |"
इन्हीं सब बातों के दृष्टिगत, मैंने यह वेबसाइट बनाई ताकि युवाओं से अपने अनुभव साझा कर सकूं जिससे ज्यादा से ज्यादा युवा, फिजूल कार्यों, दिखावों और सतही समस्याओं से उलझे बिना खुद की ऊर्जा और संसाधनों को स्वयं की और देश की समृद्धि में लगा सकें।
जहां कहीं भी झूठ, उत्पीड़न, दबाव, लापरवाही या असंवेदनशीलता देखो, भिड़ जाओ।
ये है असली एडवेंचर जब आप अन्यायी लोगों से भिड़ते हो फिर कुछ जरुरी काम अपने आप होने लगते हैं:
१. आलस भाग जाएगा क्योंकि अब आपको शरीर भी मजबूत रखना है और मन भी।
२. अध्ययन में लग जाओगे क्योंकि अब बारिकियों में जाना पड़ेगा।
३. दोस्त बदल जाएंगे क्योंकि अब झूठे, सतही, मक्कार और डरपोक लोगों से दूर ही रहने का मन करेगा।
४. आवाज़ में मजबूती, दृढ़ता और संकल्प दिखेगा ।
अन्याय करने वाला आपको भ्रम में डालकर आपके हौसले को डगमगा सकता है अतः जिन चीजों को लेकर आप विरोध कर रहे हैं या जिन मांगों को लेकर आप संघर्ष कर रहे हैं, उनको लेकर स्पष्टता रखें ताकि आपको संशय या दुविधा में डालकर आपका हौसला न कम किया जा सके क्योंकि लोग हौसला तोड़कर ही पराजित करते हैं।
-लवकुश कुमार
हार-जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण है हौसला ।
अगर सही लड़ाई लड़कर हार भी गए तो वो जीत है क्योंकि आपने ये दिखा दिया कि ग़लत और अन्याय करने वाले बेरोकटोक अपना काम नहीं कर सकते, उन्हें कीमत चुकानी पड़ेगी।
आपका हौसला ही उन्हें उनके ग़लत होने का एहसास कराएगा उन्हें मजबूर करेगा कि वो अपने अन्यायपूर्ण निर्णय पर पुनर्विचार करें।
- लवकुश कुमार
५ वर्ष का यथार्थ अपनी दादी के साथ शाम को मोहल्ले की खाली रोड पर टहल रहा है|
स्वच्छ हवा और शांत माहौल में उसके मन में एक पुराना सवाल कौंध आता है और वह अपनी जिज्ञासा हेतु अपनी दादी से पूछता है कि दादी, पलक बुआ कि शादी में जब वो दुल्हन बनी होती हैं तो दूसरी बुआ लोग उनके आगे फूल क्यों डालती हैं ?
ताकि बुआ को ऐसा महसूस हो कि वो खास हैं, राजकुमारी हैं हालांकि वो न तो खास हैं और न ही राजकुमारी, दादी का जवाब आता है।
- लवकुश कुमार
एक दृश्य में एक शायर, अपनी शायरी पाठ के बीच में बार-2 उस जलसे के आयोजक जोकि एक ज्ञानी इंसान थे उनका नाम ले रहा था और उनके जनहित के कार्यों को उद्धृत कर रहा था |
इसी घटना का सन्दर्भ लेते हुए क्या हम ये नहीं कर सकते कि जब किसी से बात करें तो उनका नाम लें बीच बीच में जरुरत के अनुसार, क्या होगा इससे ? इससे सामने वाले इंसान को अच्छा महसूस होगा और उसकी तरफ से बेहतर प्रतिक्रिया और बेहतर प्रदर्शन मिलेगा |
"वो फाइल उठा देना" से बेहतर है कि आप कहो कि " मोहन वो फाइल उठा देना"
"ठीक है" कहकर फ़ोन रखने से बेहतर है की आप कहो " ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ " या "ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ फिर बात होगी " या "ठीक है सोहन फ़ोन रखा जाये अब ? " या "ओके बाय मोहन रखता हूँ अब " |
नोट- हर किसी न किसी का कोई महत्व होता है, किसी को अपने व्यवहार से महत्वहीन न महसूस कराएँ
हर किसी से इंटरैक्ट करना जरुरी नहीं लेकिन जिससे इंटरेक्शन कर रहें हैं कम से कम उससे बात करते वक़्त उसकी गरिमा का ध्यान रखें और उसके कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें अगर कोई शब्द नहीं कह सकते तो एक प्यारी सी मुस्कान क्योंकि मुस्कान से हर्ष का पता चलता है और " हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है "
-लवकुश कुमार
जिस दिन हम "तथाकथित" छोटे से छोटे पद वाले इंसान को भी इंसान समझकर उसकी गरिमा का सम्मान करते हुए मान देंगे उस दिन "तथाकथित" बड़े पद वाले लोगों के प्रति इनके मन से जलन कुछ कम हो जाएगी |
जैसे एक ड्राइवर भी चाहता है कि लोग उसे ड्राइवर नहीं उसके नाम से बुलाएँ जिसे उसके माता पिता ने बड़े प्यार से रखा होगा |
-लवकुश कुमार
सही काम में लगे रहो, बिना तारीफ की आकांक्षा के क्योंकि अमूमन लोग तारीफ और समर्थन आपकी नहीं अपनी जरूरत और सहूलियत के हिसाब से करते हैं, जिस दिन आपका काम जिस इंसान को महत्व का लग जायेगा फिर उसकी तरफ से तारीफ भी होगी और समर्थन की पेशकश भी।
-लवकुश कुमार
लोगों के मनमाने व्यवहार और असीमित उपभोग की आकांक्षाओं ने धरती और सभ्यता को संकट में डाल दिया है - ग्लोबल वार्मिंग, बिखरते रिश्ते, तनाव, बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना, सामाजिक प्रतिष्ठा की चाह के चलते समाज से रिकग्निशन पाने की गैर जरूरी हद तक कामना इत्यादि।
जब अमूमन वाट्सैप स्टेटस पर पर्यटन के फोटोज या सतही ज्ञान के वीडियो/फोटो दिख रहे हों उस बीच " जीवन, मानव मन और दुनिया की बारिकियों या फिर इंसान की विरोधाभासों से भरी जिंदगी पर एक नजर डालने का इशारा है। "
हो सकता है कि २५० लोगों में ऐसे भी लोग हों जो स्टेटस में लेख या उक्ति देख बिना पढ़े आगे बढ़ा देते हों
कुछ ऐसे होंगे जो सहमत न होते होंगे और इन्हें किताबी बातें बोलकर चिढ़ जाते हों
कुछ ऐसे होंगे जो आंशिक रूप से सहमत होते होंगे
कुछ तो इन्हें जीवन में उतारते होंगे
कुछ के दिमाग के किसी कोने में पड़ जाते होंगे, ताकि वक्त जरूरत स्पष्टता में काम आयें
कुछ के जीवन में चल रहे झंझावातों और उलझनों का समाधान मिल जाता होगा
कुछ तो मेरे स्टेटस को रिपोस्ट करते हैं अपनी वाल पर
या वो खुद भी उक्तियों को स्टेटस में लगाना आदत में ले आते हैं।
मेरी कल्पना में है वो एक दिन जब आपकी कांटैक्ट लिस्ट के कई लोगों के वाट्सैप स्टेटस में होंगी ऐसी पंक्तियां जो हमारी समस्या का हल हो सकती हैं
या हमें हमारी मानसिक गुलामी का एहसास करा सकती हैं
या हमें हमारे जीवन के झूठ को आयने में दिखा सकने की क्षमता रखती होंगी
या फिर वो हमारे जीवन और समाज की असली और केंद्रीय समस्या की तरफ हमारा ध्यान खींच सकती हैं
या वो हमें ये अहसास दिला सकती हैं कि हमें कोई अधिकार नहीं अपनी आराम और विलासिता के लिए, समाज और वातावरण को खतरे में डालने का
या वो लोगों, स्वयं और दुनिया को लेकर हमारे भ्रम को तोड़ हमें तनाव और दबाव से मुक्त कर सकती हैं।
अगर आप भी किसी बिंदु से सहमत हैं तो उठाइए एक कदम खुद की और उस माहौल और उस हवा को बेहतर करने को जिसमें हम सांस लेते हैं।
जब हमारे कार्य के पीछे जनहित होता है फिर हमें ये न सोचना चाहिए कि लोग ( संकीर्ण समझ के लोग) हमारे बारे में क्या सोचते हैं।
शुभकामनाएं
- लवकुश कुमार