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"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब
यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।
जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।
जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।
पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:
कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते हुए उसे अपमानित करते थे।
"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"
हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।
"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"
मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता। खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।
"महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"
यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।
यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।
हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ ।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें
सम्पादक
लवकुश कुमार
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शुभकामनाएं
It is a matter of great happiness for me that the book I have been working on for so many months will soon be available to students. Before that, I am presenting an excerpt from the main book to all of you for introduction and your feedback. Please be sure to send your response by email at: KCPHYQA@GMAIL.COM
A name that is in accordance with its purpose:

The author’s introduction is necessary and also relevant for the evaluation of the book’s content.

Why should this book be purchased, and how can it be different from other books? A few points on this:

Since this book is for students, some of the problems faced by students that have been addressed are:


Some reasons that made it necessary to write this book:


Some examples of "step by step solution" from the book


Five point SOP

• To obtain the main book, please fill out the “Pre-booking of Book” query form on the website (Lovekushchetna.in).
• No one can make you feel inferior without your consent.
— E. Roosevelt
• Best wishes in abundance — towards excellence through practice.
• If you have any doubts, please write to KCPHYQA@gmail.com
A phone recharge may last for a month, but a book can last for many years.
Many younger brothers and sisters can read it, and there is no time restriction.
No matter how many times a student reads it, unlike a mobile phone, it does not strain the eyes.
Moreover it does not suggest advertisements or unnecessary short videos.
Please do let me know how well the book lives up to its objectives. Before that, kindly book your copy or submit a demand through your nearest book seller (please fill in the address form for the book - https://lovekushchetna.in/pre-booking.php).
Best wishes
Yours,
Lovekush Kumar
अपनी तुम राह से भटके हुए,मंजिल भुला बैठे।
जो पाना चाहते थे तुम, खोकर सोंचते रोते।।
मुश्किलें राह में होंगी,अगर मुँह मोड़ लोगे तुम।
हँसेगे राह के पत्थर, और कायर बनोगे तुम।।
चाहे कितनी मुश्किलें हों,अपनी तुम राह मत छोड़ो।
न देखो राह के काँटे,हों चाहे आग के शोले।।
रहे बस याद यह तुमको, कोई गुमराह न कर दे।
खिले जो फूल गुलशन के,उन्हें झंखाड़ न कर दे।।
भला क्या बिन तपाये आग में,सोना निखरता है।
गुजर कर मुश्किलों से ही,कोई मंजिल पकड़ता है।।
अरे तुम हो नये राही,नजर इतिहास पर डालो।
परिश्रम में सफलता है,यही तुम तर्क अपनालो। ।
बढ़ो तुम वेग से आगे,मन में संकल्प तुम कर लो।
छोड़ दो जिन्दगी का सुख,लक्ष्य पाने का दम भर लो।।
एक कछुआ निरन्तर वेग से, निज लक्ष्य पा जाता।
मगर ठहरे हुए खरहे का,घमण्ड उसे चूर कर जाता।।
हुनर कोई अगर तुममे,जरा है कामयाबी की।
दिखा दो सुनहरी रंगत, अपने कारनामों की।।
कोशिशें लाख तुम कर लो,अपनी कमियाँ छिपाने की।
न बगुला हंस बन सकता, करे कोशिश बनाने की।।
अगर है अहमियत तुममें,खुद को बेहतर बनाने की।
करो तुम काम भी वैसा,कोशिशें आजमाने की।।
- ममता
लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश
ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है।
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में।
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।
आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।
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शुभकामनाएं
बीती निशा की वेला
तम का कहर यूँ छूटा
आयी सुबह सुहानी
रक्तिम भानु लुढ़का
नभ की विरल दिशा में
दिनकर प्रभा यूँ फूटी
बीत गया समय
तरुओं की डालियों में
विहगों का मधुर कलरव
दुर्वा की तीक्ष्ण नोकों पे
चमकती तुषार बूँदे
दिनकर की तीव्र किरणें
तुषार बिन्दु पीती
बीत गया समय
निर्झर की मन्द झर-झर
सरिता प्रवाह कल-कल
दिवा पहर यूँ ढलता
ऊषा यूँ गुनगुनाती
गुंठन ये अपना खोले
बीत गया समय
छायी निशा घटायें
अम्बर के पट के भीतर
मुक्ता का तेज चमके
मणिमय कन्दुक लुढ़के
शिशुओं के चक्षुओं को
निद्रा का देते दामन
बीत गया समय ।
- ममता
लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश
ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है।
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में।
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।
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शुभकामनाएं

उपन्यास - दीवार में एक खिड़की रहती थी
लेखक- विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” हिन्दी साहित्य में साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाओं को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास किसी बड़े घटनाक्रम, तीव्र संघर्ष या नाटकीय मोड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि मध्यमवर्गीय जीवन की रोज़मर्रा की सच्चाइयों, सीमाओं और छोटी-छोटी खुशियों को बहुत सहजता से प्रस्तुत करता है।
कहानी एक नवविवाहित मध्यमवर्गीय दंपत्ति रघुवर प्रसाद और सोनसी के इर्द-गिर्द घूमती है। रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित के अध्यापक हैं और शादी के बाद वे एक कमरे के छोटे से मकान में अपनी गृहस्थी बसाते हैं। इसी छोटे से कमरे में उनके सपने, चिंताएँ, आदतें और छोटी-छोटी खुशियाँ धीरे-धीरे आकार लेती हैं। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक अनायास ही उनके जीवन से जुड़ने लगता है, मानो वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आस-पड़ोस में रहने वाले लोग हों। इस एक कमरे के मकान में भीतर की ओर बनी एक खिड़की "उपन्यास की आत्मा" बन जाती है।
यह खिड़की केवल रोशनी या हवा का रास्ता नहीं है, बल्कि यह रघुवर और सोनसी के "मन की दुनिया" से जुड़ने का माध्यम है। यही खिड़की उन्हें एक सीमित जीवन के भीतर भी सपने देखने, सोचने और उम्मीद बनाए रखने का अवसर देती है। प्रकृति और आसपास के वातावरण का चित्रण भी इसी खिड़की के सहारे बड़ी सहजता से कथा में घुल-मिल जाता है।
उपन्यास में दीवार जीवन की उन सीमाओं का प्रतीक है, जो हर आम आदमी के हिस्से में आती हैं—कम जगह, कम साधन और अनकही मजबूरियाँ। लेकिन उसी दीवार में बनी खिड़की यह भरोसा देती है कि सीमाओं के बीच भी उम्मीद के रास्ते मौजूद होते हैं। यही वजह है कि इस किताब को पढ़ते हुए पाठक अपने जीवन की दीवारों और उनमें छिपी खिड़कियों को देखने लगता है।
इस उपन्यास की भाषा बेहद सरल, शांत और आत्मीय है। इसमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को बड़े सलीके से महत्व दिया गया है। लेखक बिना किसी उपदेश के यह बात कह जाते हैं कि सच्चा सुख भव्यता में नहीं, बल्कि साधारण पलों को जीने की क्षमता में छिपा होता है। रघुवर और सोनसी की सादगी, उनका रहन-सहन और उनका आपसी संबंध पाठक के मन में एक गहरा अपनापन जगा देता है।
हालाँकि यह उपन्यास तेज़ गति से आगे नहीं बढ़ता। कहानी की चाल धीमी है और इसमें कोई बड़ा मोड़ या चौंकाने वाली घटना नहीं मिलती। जो पाठक तेज़ रफ्तार या केवल मनोरंजन की अपेक्षा से किताब उठाते हैं, उन्हें यह थोड़ी भारी लग सकती है। लेकिन जो पाठक "जीवन को ठहरकर देखने और महसूस करने का धैर्य" रखते हैं, उनके लिए यह कृति खास बन जाती है।
कुल मिलाकर, “दीवार में एक खिड़की रहती थी” एक ऐसा उपन्यास है जो शोर नहीं करता, बल्कि चुपचाप दिल के पास बैठ जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि "सुख एक कमरे के छोटे से घर में भी पाया जा सकता है, बस ज़रूरत है उस दीवार में बनी खिड़की को देखने की।"
ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी और इसकी सबसे गहरी मानवीय सच्चाई है।
" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "
शुभकामनाएं
विशाल चन्द @reading_owl.3
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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पहले जब छोटी थी तो 26 जनवरी मुझे सिर्फ लड्डू खाने का दिन लगता था और यह पता था कि संविधान इस दिन लागू हुआ था, लेकिन जब बड़ी हुई और मैंने संविधान को कुछ हद तक समझा और यह जाना कि संविधान बनाने के पीछे कितने लोगों की मेहनत लगी है और उससे भी पहले कितने लोगों को इसके लिए कितना बलिदान करना पड़ा है और इसके पीछे कई दार्शनिक मूल्य हैं तब यह जानकर मेरे लिए संविधान के प्रति बहुत आदर बढ़ गया है।
मुझे लगता है कि यह आदर सिर्फ मेरे मन में ही नहीं होना चाहिए बल्कि जितने भी पढ़े लिखे और जागरूक लोग हैं जिनको संविधान के बारे में पता है उनको चाहिए कि वो दूसरों को इन चीजों के बारे में बताएं कि हमारे संविधान में क्या है? हमारे मूल अधिकार क्या है? हमारे कर्तव्य क्या हैं? इन सभी के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए खासकर गांव वासियों और मुख्य धारा से कटे हुए तबके को, जिससे कि हम अपने संविधान के बारे में बेहतर और सूक्षमता से जान सकें और इस तरह से हम अपने संविधान के प्रति और गणतंत्र दिवस के प्रति आदर को व्यक्त करे।
संविधान के बारे में जानना सिर्फ संविधान के बारे में जानना ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं बढ़कर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना है, खुद को और अपने अधिकारों और दायित्यों को समझना है।
हमें पता होना चाहिए कि अगर हम एक गलत वोट कर रहे हैं तो उसका कितना बड़ा असर हमारे देश पर पड़ रहा है या हम वोट न करके क्या कर रहे हैं? उसका क्या असर हमारे देश पर पड़ता है? हमें पता होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा कहाँ तक होती है? भारतीय संविधान में धर्म क्या है? महिलाओं के लिए क्या अधिकार है? स्वतंत्रता क्या है? हम अपने संविधान के अनुच्छेदों का दुरुपयोग न करें, उनका अच्छे से पालन करें, उनको हम बहुत अच्छे से समझें यह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।
हमारे संविधान निर्माता एक धर्म निरपेक्ष और समानता वाला भारत चाहते थे न कि ऐसा भारत जिसमें साम्प्रदायिक उन्माद हो, जो विज्ञान नहीं अंध विश्वास को महत्व दे, वो भारतवासी होकर नहीं बल्कि किसी क्षेत्र विशेष का होकर बोले।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में ही है *हम भारत के लोग* और आज सच मे बहुत जरूरी है कि हम सही चीजें समझ पाये क्योंकि यही समझेंगे तो सही लोगों को शक्ति मिलेगी और उसी से ये देश बदलेगा। हमें साथ आने की जरूरत है हमें भारतवासी सबसे पहले होने की जरूरत है। आइए साथ मिलकर एक संकल्प ले कि जिन लोगों को संविधान के बारे में पता है वो दूसरों को समझाएंगे और जिनको नहीं पता वो पढ़ेंगे और समझेंगे।
आइए हम जिम्मेदारी ले अपने भारत को फिर से महान बनाने की, उसकी खोयी हुई प्रतिष्ठा वापस लाने की।
आइए गणतंत्र दिवस कुछ ऐसे मनाए,
कि हर दिन गणतंत्र दिवस बन जाए।
गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए?
लेखक : कैलाश सत्यार्थी
प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स
तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में कई सवाल उठते हैं।
इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—
“तुम पहले क्यों नहीं आए?”
यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है।
किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे?
हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।
" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "
शुभकामनाएं
विशाल चन्द @reading_owl.3
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।
हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?
जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?
हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।
हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।
वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|
व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!
"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"
फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।
हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।
यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।
क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।
यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।
- सोनम वर्मा
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|
आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|
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शुभकामनाएं
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आशा है की आपकी रचनाएँ पाठकों को स्पष्टता देंगी और उन्हें समाज में व्याप्त दिक्कतों के प्रति संवेदनशील बनायेंगी |
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सम्पादक
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The objective is to provide students with solutions to their challenges and mistakes, enabling them to achieve a better understanding of physics and achieve good scores to fulfill their dreams.
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- Lovekush Kumar