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नाम हमारी पहचान बनता है, नाम का असर हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है, इसीलिए मेरे विचार से हमे अपने बच्चों का नाम केवल इस बात पर न रखना चाहिए कि वो सुनने मे अच्छा या सबसे अलग और यूनीक लग रहा है, बल्कि ऊपर लिखी बात को भी ध्यान मे रखना चाहिए, बच्चों का जीवन बेहतर हो और वो समझदार बने इसके लिए हम सभी प्रयास करते हैं, कितना अच्छा हो कि उनका नाम ही ऐसा रख दिया जाए जो हमारे उद्देश्य मे मदद करे|
नामों की सूची से पहले आइए पढ़ लेते हैं,नाम के महत्व पर दो घटनाएँ :
घटना-1
क्या नाम है तुम्हारा?,
लवकुश, मैंने जवाब दिया
अच्छा! लव और कुश दोनों
हाँ जी दोनों, मै मुस्कुरा दिया
सही है तुम काम भी तो दो कर रहे हो,
मै उस वक़्त आंटा चक्की पर आंटा उठाने गया था
मै बचपन से ही अपनी पढ़ाई के साथ घर के छोटे मोटे कामों मे हांथ बटाता रहा
मेरा नाम भगवान श्री राम के पुत्रों के नाम पर होने के चलते हमेशा मुझ पर एक नैतिक दबाव रहा कि कोई ऐसा काम नहीं करना कि मेरा नाम चरितार्थ न हो सके, प्रयास रहा, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा, यह तो समय और आप बताएँगे |
घटना-2
ऐसे ही एक घटना दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार के जीवन से है, पूरब पश्चिम फिल्म मे उनका नाम भारत था और उस फिल्म मे उन्होने इतना अच्छा काम किया, कि लोग उन्हे भारत के नाम से ही जानने लगे, एक दिन जब वो किसी रेस्तरां मे सिगरेट पीने को हुये तो किसी ने उन्हे टोंक दिया और कहा कि आप तो भारत हैं, आपको ये शोभा नही देता |
सबसे खास बात है कि आप या आपका बेटा अपना नाम कई बार सुनता तो उसका अर्थ भी उसके अचेतन मन मे आता ही है, और अगर नाम का अर्थ कोई ऐसा सत्य है जो इंसान का ध्यान उस सत्य की तरफ खींचता है, तब वह सत्य के नजदीक रहता है और जीवन मे भटकने से बच जाता है और सही दिशा मे चलने को प्रेरित होता है |
सूची (अर्थ, गूगल पर ढूंढा जा सकता है। ज़्यादातर के अर्थ आपको पहले से ही पता होंगे, ऐसा मानकर मै अर्थ नही लिख रहा )
| क्रम | नाम (बालक) | क्रम | नाम (बालिका) |
| 1 | निश्चय | 1 | चेतना |
| 2 | सचेत | 2 | चेष्टा |
| 3 | सतर्क | 3 | साक्षी |
| 4 | यथार्थ | 4 | सताक्षी |
| 5 | प्रत्यक्ष | 5 | स्तुति |
| 6 | प्रेम | 6 | श्रुति |
| 7 | समृद्ध | 7 | समृद्धि |
| 8 | आनंद | 8 | आनंदिता |
| 9 | उत्कृष्ट | 9 | उत्कृष्टता |
| 10 | गौरव | 10 | गर्विता |
| 11 | शिव | 11 | दुर्गा |
| 12 | ब्रह्म | 12 | सरस्वती |
| 13 | गर्व | 13 | गरिमा |
| 14 | ओज | 14 | आभा |
| 15 | संभव | 15 | सृष्टि |
| 16 | सरस | 16 | प्रकृति |
| 17 | सरल | 17 | सरला |
| 18 | सहज | 18 | प्रगति |
| 19 | सटीका | 19 | प्रतिभा |
| 20 | प्रेक्षण | 20 | प्रेक्षा |
इस सूची को तैयार करने मे कई लोगों का योगदान है, कुछ के नाम याद हैं- साक्षी जी, सौम्या जी, शिवम जी, आदित्य जी, आरती जी, और कुछ कभी मिले, कभी सुने गए, उनका भी आभार |
अर्थ जानने के लिए और किसी भी नाम के फायदे जानने के लिए या और ऐसे ही नाम सुझाने के लिए ईमेल करें - lovekushchetna@gmail.com
शुभकामनायें, ताकि आपका रखा नाम आपकी संतान को समझ और स्पष्टता देने मे मदद करे |
लवकुश कुमा
नाम हमारी पहचान बनता है, नाम का असर हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है, इसीलिए मेरे विचार से हमे अपने बच्चों का नाम केवल इस बात पर न रखना चाहिए कि वो सुनने मे अच्छा या सबसे अलग और यूनीक लग रहा है, बल्कि ऊपर लिखी बात को भी ध्यान मे रखना चाहिए, बच्चों का जीवन बेहतर हो और वो समझदार बने इसके लिए हम सभी प्रयास करते हैं, कितना अच्छा हो कि उनका नाम ही ऐसा रख दिया जाए जो हमारे उद्देश्य मे मदद करे|
नामों की सूची से पहले आइए पढ़ लेते हैं,नाम के महत्व पर दो घटनाएँ :
घटना-1
क्या नाम है तुम्हारा?,
लवकुश, मैंने जवाब दिया
अच्छा! लव और कुश दोनों
हाँ जी दोनों, मै मुस्कुरा दिया
सही है तुम काम भी तो दो कर रहे हो,
मै उस वक़्त आंटा चक्की पर आंटा उठाने गया था
मै बचपन से ही अपनी पढ़ाई के साथ घर के छोटे मोटे कामों मे हांथ बटाता रहा
मेरा नाम भगवान श्री राम के पुत्रों के नाम पर होने के चलते हमेशा मुझ पर एक नैतिक दबाव रहा कि कोई ऐसा काम नहीं करना कि मेरा नाम चरितार्थ न हो सके, प्रयास रहा, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा, यह तो समय और आप बताएँगे |
घटना-2
ऐसे ही एक घटना दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार के जीवन से है, पूरब पश्चिम फिल्म मे उनका नाम भारत था और उस फिल्म मे उन्होने इतना अच्छा काम किया, कि लोग उन्हे भारत के नाम से ही जानने लगे, एक दिन जब वो किसी रेस्तरां मे सिगरेट पीने को हुये तो किसी ने उन्हे टोंक दिया और कहा कि आप तो भारत हैं, आपको ये शोभा नही देता |
सबसे खास बात है कि आप या आपका बेटा अपना नाम कई बार सुनता तो उसका अर्थ भी उसके अचेतन मन मे आता ही है, और अगर नाम का अर्थ कोई ऐसा सत्य है जो इंसान का ध्यान उस सत्य की तरफ खींचता है, तब वह सत्य के नजदीक रहता है और जीवन मे भटकने से बच जाता है और सही दिशा मे चलने को प्रेरित होता है |
सूची (अर्थ, गूगल पर ढूंढा जा सकता है। ज़्यादातर के अर्थ आपको पहले से ही पता होंगे, ऐसा मानकर मै अर्थ नही लिख रहा )
| क्रम | नाम (बालिका) | नाम (बालक) |
| 1 | श्रीधा | नित्य |
| 2 | श्रव्य | अवलोकन |
| 3 | अनुदेशिका | अनुदेश |
| 4 | निर्देशिका | निर्देश |
| 5 | जागृति | जागृत |
| 6 | जिज्ञासा | जिज्ञासु |
| 7 | नियति | वेदान्त |
| 8 | वैदेही | राम |
| 9 | अनुभूति | अनन्मय |
| 10 | तृष्णा | विवेक |
| 11 | शालिनी | शालीन |
| 12 | प्रतीक्षा | चैतन्य |
| 13 | कश्वी | जानव |
| 14 | दामिनी | रक्षित |
| 15 | प्राची | उत्कर्ष |
| 16 | मीरा | कृष्ण |
| 17 | रीत | अभिनव |
| 18 | प्रीति | प्रेम |
| 19 | युक्ति | जतन |
| 20 | श्रीधा | प्रयास |
इस सूची को तैयार करने मे कई लोगों का योगदान है, कुछ के नाम याद हैं- साक्षी जी, सौम्या जी, शिवम जी, आदित्य जी, आरती जी, और कुछ कभी मिले, कभी सुने गए, उनका भी आभार |
अर्थ जानने के लिए और किसी भी नाम के फायदे जानने के लिए या और ऐसे ही नाम सुझाने के लिए ईमेल करें - lovekushchetna@gmail.com
शुभकामनायें, ताकि आपका रखा नाम आपकी संतान को समझ और स्पष्टता देने मे मदद करे |
लवकुश कुमार
जिस स्तर पर एआई का इस्तेमाल हो रहा, इसके डेटा सेंटर ( संख्या में कई ) की कूलिंग के लिए बहुत मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है, चिंता का विषय यह है कि "क्या जितने भी लोग एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें इस जिम्मेदारी का एहसास है कि उनका एआई को दिया गया कोई भी काम सीधे पानी की खपत से जुड़ा है, ऐसा देखने में आया है कि यूट्यूब पर एआई जेनरेटेड कंटेंट की भरमार हो रखी है, बहुत से गैर जरूरी और एक जैसे ही, यह एक उदाहरण है...... बाकी पाठकों पर छोड़ता हूं.....
-लवकुश कुमार
यह लेखक के निजी विचार हैं।
जंगल के राजा मटकू शेर ने दिन-ब-दिन अपने जंगल की हालत को खस्ता होते देख सर्वे करवाया कि-
'आखिर हमारे जंगल में ऐसी कौन सी गड़बड़ी हो रही है? जिसके कारण विकास आधा अधूरा ही हो रहा है।'
सर्वे में पाया गया कि यहां बाहर से बहुत सी भेड़ें और बुजुर्ग जानवर आकर रहने लगे हैं भेड़ों से बात की तो ज्ञात हुआ कि उनके शरीर पर ऊन लदा हुआ है उन्हें काम करने से बहुत गर्मी का एहसास होता है इसीलिए वे काम नहीं कर पाती हैं, वहीं दूसरी और बुजुर्ग जानवरों ने कहा कि- 'हमे ठंड बहुत ज्यादा लगती है हम बीमार पड़ जाएंगे इसलिए खुले में काम नहीं कर सकते। '
इन लोगों के कारण जंगल पर खर्च का भार बढ़ रहा था और विकास कार्य में बाधा आ रही थी।
इस समस्या के निदान हेतु मटकू शेर ने अपने सभी साथियों से विचार विमर्श किया और एक-एक कर सभी को इस समस्या को दूर करने हेतु अवसर भी दिया, किंतु असफलता ही हाथ लगी अंत में न चाहते हुए भी एक बहुत शरारती बंदर,चंकु को नियुक्त किया|
चंकु बंदर इस समस्या से निजात पाने हेतु जी जान से जुट गया उसने भेड़ो एंव बुजुर्ग जानवरों को सुना, समझाया, मान मन्नौवल की, फिर भी वे टस के मस नहीं हुए आखिर हार कर चंकु बंदर ने अंतिम उपाय का सहारा लिया जिससे भेड़े और बुजुर्ग जानवर अपनी शक्ति अनुसार कार्य करने लगे और देखते ही देखते कुछ ही दिनों में जंगल ने तरक्की की राह पकड़ ली यह देख मटकू शेर बहुत खुश हुआ और उसने पूछा-
" चंकु ! तुम एक बात तो बताओ जिस समस्या का समाधान हम मे से कोई नहीं कर पाया तुमने इतनी जल्दी कर दिखाया आखिर कैसे ?"
चंकु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-
" शेर राजा ! मैने ज्यादा कुछ नहीं किया भेड़ो के शरीर पर लदे ऊन को काटकर उनके स्वेटर बना बुजुर्ग जानवरों को पहना दिये ।"
जवाब सुन मटकू शेर बहुत खुश हुआ और चंकु को उसकी सूझ बूझ से समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए पुरष्कृत किया और उसे विकास मंत्री बना दिया |
- मीरा जैन
उज्जैन, मध्य प्रदेश
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं|
अधिक जानने के लिए क्लिक करें।
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बचपन से न जाने कैसे गुजर कर
बेटियां
औरत बन जाती हैं
और
बना दी जाती हैं
पहले से ज्यादा मजबूत
जिन औरतों की हथेलियों पर तैरकर
बच्चे जवान हुए
जिसने अपनी पीठ को घिसकर
उन्हे और मुलायम बनाया,
जिनकी धरती रह ही नहीं सकती कभी सहज
जो दिन-रात
अपने बच्चों के लिये
खड़ी रही
दिहाड़ी के मजदूरों की तरह
वे आज खुद बंट रही है अपने ही घरों में
ले रही हैं मुर्दा सांसें
और
लगातार स्थानांतरित की जा रही हैं आश्रमों की ओर
यह दंश हमारे विभाजन से ज्यादा गहरा है
कोई कह दे कि
दुनियों की कोई माँए सहनशील नहीं रही
जिसने घर को जोड़ने के लिये
मशक्कत न की हो
जिसने कभी गद्दारी की हो अपने बच्चों के लिये
जो औरते ताप के दिनों में भी
अपने बच्चों को पीठ पर ढोया करती हैं
वे ही ज्यादा शिकार हुई है घरों में
औरतें औरत होती नहीं
बल्कि
सामाजिक मर्यादाओं को पालते-पालते
बना दी जाती हैं।
पूजा कुमारी
coolpooja311@gmail.com
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खुशी से सराबोर सम्यक दौड़ता हुआ अर्पण से लिपट गया और अंकसूची बताते हुए कहने लगा- "अर्पण ! तुम्हारे कारण आज मै कक्षा में प्रथम आया हूं यदि उस दिन तुम मुझे अपनी साइकिल नही देते तो शायद मै परीक्षा देने स्कूल ही नही पहुंच पाता और फेल हो जाता । एक बात तो बताओ अर्पण ! खेलते खेलते हम दोनो में लगभग छ: माह पहले लड़ाई हो गई थी तब से हमारी बोलचाल बंद थी हम एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे, परीक्षा वाले दिन जब मैने स्कूल जाने के लिए साइकिल बाहर निकाली , उसका पहिया पंचर देख मेरे होश उड़ गए सोचने लगा-अब क्या होगा ? पापा भी बाहर गए हुए हैं , मै परीक्षा देने स्कूल कैसे पहुचुंगा, इसी घबराहट में मेरे आंसू छलक आए। कुछ समय पश्चात ही तुमने अपनी साइकिल मेरे हाथों में स्कूल जाने हेतु दे दी और ना चाहते हुए भी, मजबूरीवश तुम्हारी साइकिल लेकर चला गया पर एक बात तो बताओ तुम्हारे मन में मेरे प्रति अचानक प्रेम भाव कैसे उमड़ आया ?"
अर्पण ने सच बोलते हुए कहा- " "सम्यक ! सच तो यह है कि मै तुम्हारी साइकिल का पहिया पंचर देख बहुत खुश हुआ था कि तुम अब परीक्षा देने नहीं जा पाओगे लेकिन खिड़की से दादाजी ने साइकिल के कारण तुम्हें रोते हुए देख लिया उन्होंने तुरंत मुझे आदेश दिया- जाओ अपनी साइकिल सम्यक को देकर आओ पहले तो मैने ना नुकुर की किंतु बाद में मान गया जब दादाजी ने कहा-अर्पण बेटा मुसीबत में जो दूसरों के काम आए वही सच्चा इंसान होता है बाकी तो सब स्वार्थी , हो सकता है कभी तुम भी ऐसी स्थिति में फंस जाओ और तुम्हारी कोई मदद ना करे तो तुम पर क्या बीतेगी, साथ ही पड़ोसियों को तो हमेशा एक दूसरे से मिलकर ही रहना चाहिए, यूं भी परोपकारिता बहुत बड़ा धर्म है।"
सम्यक ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा-
" मां, कहती है घर में बड़े बुजुर्गों की बात हमेशा माननी चाहिए वह हमें अच्छा इंसान बनाने में मदद करते हैं।"
- मीरा जैन
उज्जैन, मध्य प्रदेश
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।
मो.9425918116
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पुस्तक समीक्षा :आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में
लेखिका : मिचिको आओयामा | प्रकाशक : पेंगुइन स्वदेश
टोक्यो की एक शांत-सी सामुदायिक लाइब्रेरी पर आधारित उपन्यास, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में केवल किताबों की कहानी नहीं है, बल्कि उन इंसानों की कथा है जो अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ठहर गए हैं।
इस लाइब्रेरी की रहस्यमयी लाइब्रेरियन सायूरी कोमाची पाठकों को सिर्फ़ किताबें नहीं देतीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सवालों और उलझनों को पढ़ लेती हैं। अक्सर वह ऐसी किताब थमा देती हैं, जिसकी ज़रूरत सामने वाले को होती है—भले ही उसे खुद इसका एहसास न हो।
यह उपन्यास पाँच अलग-अलग पात्रों की कहानियों के माध्यम से आगे बढ़ता है। कोई अपने काम से ऊब चुका है, कोई मातृत्व और अपने अधूरे सपनों के बीच झूल रहा है, तो कोई जीवन के अगले अर्थ की तलाश में भटक रहा है। ये सभी पात्र अपने जीवन के ऐसे पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ एक छोटा-सा बदलाव, एक सही सवाल या एक किताब उनका सोचने का नज़रिया बदल देती है।
कहानी में जीवन को ‘merry-go-round’ यानी झूले की तरह दिखाया गया है—जहाँ हर इंसान किसी और की स्थिति से ईर्ष्या करता है, जबकि असल में सुख की कोई स्थायी अवस्था होती ही नहीं। यह विचार बड़े सरल और सहज ढंग से जीवन की गहरी सच्चाइयों को सामने रखता है, बिना किसी भारी दर्शन के।
पढ़ते समय महसूस होता है कि किताब की गति काफ़ी शांत है। कहीं-कहीं विचारों में दोहराव भी लगता है और तेज़ रफ्तार कहानी पसंद करने वाले पाठकों को इसका धीमापन खटक सकता है। लेकिन जो पाठक ठहरकर, मन से पढ़ना पसंद करते हैं, उनके लिए यह किताब एक सुकून भरा अनुभव बन जाती है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त इसकी "we" feeling यानी “हम” की भावना है—छोटे-छोटे रिश्ते, अजनबियों के बीच पनपती दयालुता, और संवाद की अहमियत।
किताब यह याद दिलाती है कि जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता, लेकिन कई बार अनपेक्षित मोड़ हमें ठीक वहीं पहुँचा देते हैं, जहाँ हमें होना चाहिए।
कुल मिलाकर, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में एक हल्की, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली किताब है। यह जीवन बदल देने का दावा नहीं करती, लेकिन पढ़ते-पढ़ते मन को थोड़ा शांत ज़रूर कर देती है—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "
शुभकामनाएं
विशाल चन्द @reading_owl.3
https://www.facebook.com/vishal.chandji
https://www.instagram.com/reading_owl.3
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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For minimum wavelength full KE of the electron will be converted to photon so energy of photon is eV in turn wavelength proportional to 1/V that is inversely proportional to V.
“परख” इसे जिसने केवल प्रेम संबंधी रचना समझा, वो इसके असली मर्म को समझ ही नहीं पाया।
हमारे जीवन में ये प्रायः होता है कि हम जिसके सबसे नज़दीक होते हैं उसे हम वास्तव में परख ही नहीं पाते। जैसे कि इस कृति मे पिताजी ने अपने पुत्र बिहारी को और सत्य ने कट्टो को परखने में भूल की, किंतु बिहारी और कट्टो जो एक दूजे से कुछ क्षण को मिले और परख पाये कि दोनों एक दूजे के लिए उपयुक्त हैं।
परख लालच और पैसों से कभी नहीं होती, सेवाभावी से होती है ,और यह भाव निश्छल, निष्कपट प्रेम माँगता है। शुरुआत में महसूस होता है कि कट्टो और सत्य की प्रेमकथा है, किंतु वास्तव में यह उपन्यास बिहारी और कट्टो के उन अनछुए पहलुओं के बारे में है जो समय आने पर ही दिखते हैं।
अपितु इस कहानी का केंद्रबिंदु कट्टो है किंतु कट्टो के गँवरपन (शहरी लोगों के अनुसार) में व्यक्तित्व की असली परख छुपी हुई है, ठीक उसी तरह जिस तरह बिहारी की अपव्ययता के चर्चों में उसका वास्तविक कारण।
"दर्शन, उपन्यास के रूप मे|"
यदि कालजयी से भी ऊपर कोई शब्द है तो इस उपन्यास को उस श्रेणी में रखना सर्वथा उचित है, क्योंकि इसकी प्रासंगिकता जो तब थी जब यह लिखा गया, वही आज भी है |
तो क्या ख्याल है ?, कब पढ़ रहे इस कृति को ?
जरूर पढ़िये, साझा करिए और परिचर्चा भी
शुभकामनायें
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
समीक्षक, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
समीक्षक के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
इस लघु समीक्षा सह परिचय पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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चिम्मी खरगोश ने जब से होश संभाला स्वयं को चाची के साथ छोटे से बगीचे की मुलायम घास पर या फिर बारिक तारों से बने पिंजरे में ही पाया।
बाहर की दुनिया से वह बिल्कुल अंजान था, दोस्त के नाम पर केवल घर की मालकिन अर्थात् चाची ही थी| चाची उसका पूरा ख्याल रखती थी उसे नहलाती धुलाती , खाना खिलाती यहां तक की उसके साथ खूब खेलती भी थी इसीलिए चिम्मी को कभी अकेलापन महसूस नही होता फिर भी बाहर की दुनिया देखने की लालसा उसके मन में सदैव बनी रहती , सोचता- ' चाची तो ले नहीं जाती हैं कभी मौका मिला तो बाहर अकेले ही घूम आऊंगा'
यूं तो वह हमेशा खुश रहता किंतु जब भी पड़ोसी के भारी-भरकम कुत्ते जिम्मी पर नजर पड़ती तो उसका डील-डौल और आंखें देख यह सोच डर जाता कि कभी इसे मौका मिला तो निश्चित ही मुझे खा जाएगा, इसीलिए वह कभी जिम्मी की ओर देखता ही नहीं, कभी अनायास उससे नजरें मिल जाती तो भयभीत हो जाता। अपने और चाची में मस्त चिम्मी आराम से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। लगभग यही बंधी बंधाई जिंदगी जिम्मी की भी थी फर्क बस इतना था उसका मालिक दोनों टाइम उसे बाहर घूमाने ले जाता , बस ! यही बात चिम्मी को अखरती कि चाची उसे भी बाहर घूमाने क्यों नहीं ले जाती है ?
एक दिन की बात है चिम्मी, चाची के साथ बगीचे में उछल-कूद कर ही रहा था तभी अचानक चाची से मिलने कोई आ गया, चाची गेट खोल उससे बात करने लगी ही थी कि मौका देख चाची से नजर बचाते हुए चिम्मी बिना सोचे समझे चुपचाप गेट से बाहर निकल गया और सामने खुला मैदान देख दौड़ लगा दी, अपनी इस सफलता पर वह फूले नहीं समा रहा था उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे सारा जहां उसके कदमों में समा गया है।
कुछ देर पश्चात चाची को चिम्मी का ध्यान आया उसे बगीचे में न पा वह चिंतित हो गई और उसे घर से लेकर आस-पास बाहर तक ढूंढ लिया किंतु वह कहीं नजर नहीं आया , चाची को समझ में आ गया कि गेट खुला था और वह बाहर कहीं दूर निकल गया है, चाची उसके जान के खतरे को भांप पसीने से तरबतर गेट बंद कर उसे ढूंढने निकल पड़ी।
चिम्मी यहां-वहां कुलाचे भर ही रहा था कि सड़क के एक कुत्ते की नजर उस पर पड़ गई और वह ललचाई नजरों से चिम्मी की ओर बढ़ने लगा, कुत्ते को अपनी ओर आता देख चिम्मी घबरा गया, उसे अपनी मौत सामने दिखाई दे रही थी, उसे बेहद पछतावा हो रहा था कि इस तरह चुपचाप अकेले घर से बाहर क्यों निकल आया उसने चाची को नहीं बल्कि खुद को ही धोखा दिया है , अब क्या करें? उसने मन ही मन प्रार्थना की-
" हे भगवान ! इस बार मुझे बचा लो फिर कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा ।"
इसके साथ उसने साहस जुटा घर की ओर दौड़ लगा दी , आगे-आगे चिम्मी, पीछे-पीछे कुत्ता , चिम्मी ने हिम्मत नहीं हारी और पूरी ताकत के साथ दौड़ते हुए अपने घर तक पहुंच गया किंतु घर का गेट बंद देख वह हताश हो गया, अब क्या करें ? कुत्ता निश्चित ही मुझे खा जाएगा, यह सोच ही रहा था कि उसे पड़ोस का गेट थोड़ा सा खुला दिखाई दिया, मरता क्या न करता, वह उसी के अंदर घुस गया, आगे कुआं पीछे खाई देख उसका शरीर थरथर कांपने लगा क्योंकि सामने जिम्मी खड़ा था चिम्मी को देखते ही जिम्मी ने उसे आगे बढ़ दबोच लिया और तब तक दबोचे रखा जब तक सड़क का कुत्ता वहां से दूर नहीं चला गया फिर जिम्मी ने अपनी पकड़ ढीली की। चिम्मी स्वयं को जीवित पा आश्चर्यचकित रह गया उसने पूछा-
" जिम्मी भाई! आज तो बहुत अच्छा मौका था तुम मुझे खा सकते थे लेकिन उल्टे तुमने तो मेरे प्राणों की रक्षा की ।"
जिम्मी ने सहृदयता पूर्वक जवाब दिया-
"चिम्मी भाई! आखिर पड़ोसी धर्म भी तो कुछ होता है मुसीबत में अड़ोसी-पड़ोसी ही एक दूसरे की सहायता नहीं करेंगे तो और कौन करेगा।"
जिम्मी की उदारता देख चिम्मी उसके चरणों में गिर गया और अपनी गलत सोच के लिए हाथ जोड़ माफी मांगते हुए बोला-
" जिम्मी ! भाई मैने आपके लिए क्या सोचा और क्या पाया मुझे क्षमा करें।"
- मीरा जैन
उज्जैन, मध्य प्रदेश
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com
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