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"कब से लाईट गायब है? " पसीना पोंछते विनय ने चिढ़कर बन्द पड़े पंखे को देखते हुए कहा, 'चलो मोटरसाईकिल की सर्विसिंग ही करा लाता हूँ बीरबल चौक से। पर सर्विसिंग कराने जाओ तो तीन-चार घण्टे तो लग ही जाएँगे। दुकान से घर भी दूर है और मेरा मोबाइल भी खराब! कैसे होगा अब इतना टाईम पास? क्या गाड़ी छोड़कर वापस घर आऊँ और फिर जाऊँ?'
'उस दुकान के पास ही तो है न तेरे अश्विन चाचा का नया घर?' उसी समय, गई हुई बिजली वापस आ गई तो ट्यूबलाईट के साथ-साथ माँ की आँखें भी चमक उठीं, 'तेरे चचेरे भाई अनूप का! जिससे तेरी बोलचाल बन्द है। और वो भी तेरी गलतफहमी के कारण! बहुत हो गया वीनू बेटा! अब बस कर ये झगड़ा! जा, वहाँ दुकान से उन के घर हो आना।' रुका हुआ पंखा चला तो कमरे के वातावरण के साथ विनय के मन की उमस भी गायब हो गई। माँ अभी भी समझा रहीं थीं, 'अच्छा मौका है। तेरा टाईम पास हो जाएगा, गाड़ी की सर्विसिंग हो जाएगी और रिश्तों की भी!'
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
'और, कैसे हो भाई?' लेखक महोदय का जब फोन आया तो मैं बाज़ार में जलेबी की दुकान पर खड़ा था। जलेबियाँ तैयार हो रही थीं।
'ठीक हूँ सर। और बताइए सर आज कैसे याद किया?' एक नई आशंका मेरे अंदर सिर उठाने लगी थी।
जलेबी का कच्चा मैदा गर्म कढ़ाही में डाले जाते हुए मुझे सिहरता सा लगा।
'आजकल कहीं ज्यादा व्यस्त हो क्या? पर फिर भी फेसबुक तो देख ही रहे होंगे। मेरी नई कहानी को लेकर अब तक तुम्हारी कोई पोस्ट पढ़ने में नहीं आई? जबकि मैंने तुम्हें टैग भी किया था?' कड़ाही का तेल उबल रहा था '..... ग्रुप में मेरी उस नई कहानी का जो अपोज़ चल रहा है उस पर तुमने कुछ लिखा नहीं अब तक? मेरी रचना पर चल रहे इस विरोध से तुम क्या एग्री हो?'
कड़ाही में जलेबियाँ गोल-गोल हो रही थीं, कच्चा मैदा जमने लगा था।
'नहीं-नहीं सर। ऐसी कोई बात नहीं।'
'तो फिर अब तक उस पर कुछ लिखा क्यों नहीं? डरते हो क्या किसी से?'
'क्या हुआ? लकवा मार गया क्या जुबान को?'
'सर, वो क्या है?'
जलेबियों का मैदा, लाल गर्म होकर मजबूत होने लगा था, 'विथ ड्यू रिसेक्ट, दो महीने पहले आपने भी सर, मेरी एक रचना को लेकर बेवजह चले विरोध पर चुप्पी साध ली थी, ग्रुप में उस पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया था जबकि व्यक्तिगत रूप से ... आपने उस रचना की तारीफ की थी....' उस दिन जाने कैसे मुझमें हिम्मत आ गई।
'तो?' जलेबियाँ गर्म, लाल सुर्ख होने लगीं थीं, 'उसका, उस बात का क्या बदला ले रहे हो?'
'नहीं सर, मैंने सोचा आपकी भी कुछ विवशताएँ रही होंगी जो आप मौन रहे। जब इतने बड़े लेखक होकर आप सच को सच नहीं कह सके, कोई टिप्पणी करने में असमर्थ रहे तो मैं तो बहुत छोटा लेखक हूँ। आपकी बड़ी असमर्थता के आगे मेरी छोटी असमर्थता क्या लगती है? नहीं सर?'
'अरे वा, होशियार हो गया यार तू तो। पत्थर रखने लगा पास में, ईंट का जवाब देने के लिए! हा हा हा। चलो, और सब ठीक ? ..'
फिर 'ठीक' का जवाब जाने बिना ही उधर से फोन कट गया।
जलेबियाँ गरमागरम कड़ाही से निकालकर सामान्य तापमान की चाशनी में डाली जा चुकी थीं।
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
अपकेन्द्रीय बल (लघुकथा संग्रह) से साभार
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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"बैठ जाओ थोड़ा... और ये... चाय पी लो।" बची सीमेंट वह बोरी में भर ही रहा था कि मैंने उससे कहा।
सीमेंट की धूल सने हाथ, पास रखे कपड़े से पोंछकर वह जमीन पर ही बैठ गया, चाय सुड़कते हुए उसने जेब में रखी अधजली बीड़ी सुलगा ली।
"ये... बीड़ी कब से पी रहे हो ?"
"हं हं हं" वह हँसा, खाँसा और ढेर सारा धुआँ उसके मुख से निकला,
"बीड़ी तो भोत पेले से पी रा हूँ। मेरे को तो लागे हे कि जनम से पेले से... बीड़ी पी रा हूँ।" कहते-कहते फिर लम्बा कश खींचा तो बीड़ी के साथ-साथ उसकी आँखें भी चमक उठीं।
"जन्म से पहले से पी रहे हो, मतलब ?"
"मतलब ये कि जब अम्मा के पेट में था तब से..." बची हुई चाय गटकता वह हँसकर बोला, "अम्मा भी तो बीड़ी पीती थी।"
"हें ? तुम्हारी माँ बीड़ी पीती थी ?" मैंने वितृष्णा से कहा, "औरत होकर भी ?"
सुनकर उसके चेहरे ने कई रंग बदले, चेहरे से हँसी गायब हो गई, हाथ में थमी बीड़ी उसने एकाएक फेंककर पाँवों तले कुचल डाली, "हाँ साबजी, अम्मा बीड़ी पीती थी, ओरत होके भी, पण मजूरी भी तो करती थी, ओरत हो के भी ?" माथे का पसीना पोंछते हुए वह सँभला और फिर हँसा, "ये. ये पसीना और बीड़ी तो खानदानी हे साबजी !"
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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सजग (चाय की चुस्कियाँ लेते हुए) - प्रतिभा, मुझे तुमसे कुछ पूछना है।
प्रतिभा - हाँ सजग, पूछिए आपको क्या पूछना है?
सजग - मुझे कभी-2 यह डर लगता है कि हमारी दोस्ती कब तक चलेगी या चलेगी भी या नहीं?
प्रतिभा - आप ऐसा क्यों सोचते हैं जब तक हम एक-दूसरे की प्रगति, स्वतंत्रता व स्पष्टता में सहायक रहेंगे, यह दोस्ती चलती रहेगी। किसी एक का साथ भी अगर दूसरे की प्रगति में सहायक होगा तो हमारी दोस्ती बनी रहेगी। एक मित्र की उन्नति होगी तो वो दूसरे मित्र को भी तो आगे बढ़ाएगा।
सजग - धन्यवाद प्रतिभा इस स्पष्टता के लिए।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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क्या बात है समृद्ध? आजकल आधी रात के बाद भी काम करते रहते हो?
अरे कुछ नहीं प्रयास- मैं एक जुझारू और उत्साही साथी की तलाश में था और कुछ दिनों पहले ही मेरा एक ऐसे ही इंसान से परिचय हुआ, मैंने इसके लिए बहुत इंतजार किया है, इसीलिए मैं अपने सहयोगी के साथ काम करने को टालना नहीं चाहता, मैं चाहता हूँ कि वो मेरे काम को, मेरे काम के प्रति समर्पण व मेरी लगन को समझ सके। मैं अपने काम की महत्ता को अपने काम करने के तरीके से बताना चाहता हूँ। जिससे हमारे बीच इस लेखन के काम के लिए जुड़ाव की एक सही बुनियाद बन सके फिर आगे ये काम चलता रहेगा, मैं इतनी प्रेरणा उस साथी को देने की सोच रहा हूं।
प्रयास मुस्कुराते हुए- वाह, आप तो विचारों से भी समृद्ध हैं समृद्ध। आपके प्रयासों व विचारों की तो तारीफ करनी होगी, ये बात तो सही है कि किसी भी एसोसिएशन की नींव मजबूत और टिकाऊ होनी ही चाहिए तब ही उसे स्थायित्व मिलता है, फिर आपका इरादा तो जन कल्याण का है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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अद्वैत तुम अपने लिए काम करने वाले सहकर्मी के हर एक मैसेज पर जवाब या प्रतिक्रिया देते हो! सान्निध्य ने अद्वैत से पूछा।
अद्वैत - हाँ मैं ऐसा करता हूं क्योंकि मैं उसे बताना चाहता हूँ कि इवरी एफर्ट काउंट्स , हाँ उसकी सारी बातें ,अच्छी नहीं हो सकती, किसी की नहीं होती, पर मेरा उस साथी को प्रोत्साहन देने का तरीका है ये, मैं अपने कम्युनिकेशन में एक निरंतरता और सजीवता लाने को ऐसा करता हूं ताकि कम्युनिकेशन गैप की संभावना कम रहे।
वाह अद्वैत वाह, सानिध्य गर्व महसूस करता है अपने दोस्त पर।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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मंदाकिनी ने प्रिया के कांधे पर सिर टिका दिया और रोती हुई कहती रही “प्रिया आज वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर दूर चला गया"।
प्रिया ने मंदाकिनी का सिर सहलाते हुए कहा- “मंदाकिनी, समय ने तुम्हारे साथ क्रूर छल किया है, बचपन से आज तक हमेशा तुमको खुशियों की ठंडी छाँव ही मिली है, दुख तो डरता था जैसे तुम्हारे पास आने से।”
मंदाकिनी - फिर मेरे साथ ही ऐसा छल क्यों हुआ?
प्रिया - उसके हाथों को थाम के रखी हुई थी, समय के क्रूर छल का उसके पास कोई जवाब न था, बस वो भी अपनी सहेली संग कुछ आंसू ही बहा सकती थी।
लेकिन उसी समय प्रिया ने मन में सोचा, मैं आज तक एकतरफा प्रेम के चलते विकल रही हूँ व वात्सल्य का अभाव भी महसूस किया है, ईश्वर से शिकायतें करती रही, पर जिनको प्रेम और वात्सल्य का समुद्र मिला है वो मुझसे भी बहुत ज्यादा दुखी लग रहे हैं, फिर स्थाई सुख क्या है? जिसको खोने का डर न हो, सभी का प्यार मिल भी जाए तो क्या वो स्थाई रहेगा? नहीं रह सकता।
उस दिन से प्रिया सभी अस्थाई प्रेम के रूपों से अलग स्थाई प्रेम को खोज रही है, वह जानती है कि क्षणिक सुख और दुख जीवन का हिस्सा हैं। वह ऐसा प्रेम चाहती है जो हमेशा फिर उसको अपने अध्यात्मिक अध्ययन से उस परम आनंद के विषय में उस स्थाई प्रेम के विषय में पता चलता है कि भौतिक जगत में सभी में ईश्वर को देखना, जब सब में ईश्वर दिखेंगे तो कोई अपना पराया नहीं होगा, या कहें कि स्थायी प्रेम एक गहरी आध्यात्मिक स्थिति है जो स्वार्थ और भावनाओं से परे है। यह प्रेम मन की हीनता या निर्भरता से नहीं, बल्कि पूर्णता और आंतरिक शक्ति से उत्पन्न होता है। यह प्रेम अहंकार के विलय से पैदा होता है और इसका उद्देश्य व्यक्ति को मुक्ति, शांति और सच्चाई की ओर ले जाना है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
: जैनेन्द्र कुमार की कहानी खेल पढ़ी जा सकती है बेहतर समझ के लिए।
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समर्थ तुम रेस्पेक्टेबल फ्लर्ट की बात कर रहे थे, मैंने महसूस किया है इससे मुझे भी अच्छा लगता है, ऐसा कैसे होता है? समझने में समर्थ करो मुझे भी, चेष्टा, समर्थ से जिज्ञासा करती है और हंसने लगती है।
समर्थ मुस्कुराते हुए, चेष्टा, जहां तक मैने समझा है, जब कोई हमारे अच्छे दिखने की या हमारी ड्रेस की या हमारे काम/उपलब्धि/व्यवहार की प्रशंसा इस तरह करता है कि उस बात के चलते एक जुड़ाव का प्रस्ताव या रुचि अभिव्यक्त हो तो हम खुश और बहुत अच्छा महसूस करते है, इसका कारण हमारे द्वारा खुद को महत्वपूर्ण महसूस करना होता है, खासकर जब ये प्रमाणीकरण या वैलीडेशन सामने से मिले, तुमने शायद महसूस किया हो कि जब हम सामने वाले इंसान की किसी बात के लिए तारीफ करते हैं और उधर से भी हमारे किसी काम की तारीफ मिल जाए तब एक अलग ही वैलीडेशन और इंपार्टेंस की फीलिंग आती है जो हममें उत्साह और आत्मविश्वास भर देती है इससे हमारी दक्षता बढ़ती है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो हमें अपनी काम की और खुद की सार्थकता का पता लगता है, काम के प्रति समर्पण भी बढ़ता है, बशर्ते तारीफ का विषय/तरीका ऐसा न हो कि सामने वाले को ये व्यक्तिगत सीमाओं के पार या निजता का हनन लगे।
चेष्टा - ओह, अब समझ आया कि दूसरों से प्रशंसा सुनना हमारे आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को बढ़ा सकता है। जब हमें दूसरों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम अपनी क्षमताओं पर अधिक विश्वास करते हैं और खुद को अधिक मूल्यवान महसूस करते हैं। यह हमें प्रेरित भी करता है और हमें बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
हां चेष्टा अब तुम समझने में समर्थ हो चुकी हो, तुम्हारी चेष्टा सफल रही, दोनों हंसने लगते हैं।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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डाक्टर विजय अग्रवाल - https://youtube.com/shorts/HEum_9kwLbE?si=hg34u0kU3R2kO43f
आचार्य प्रशांत - https://youtube.com/shorts/KQ19l1S-6j8?si=iyyGtMyzcn1ebPRu
https://youtube.com/shorts/QKGxcMuRPuc?si=Uu1fsAFbTYJDavf8
https://youtube.com/shorts/xM83JqsWeXo?si=Ff-PWBHnfW6ISl0m
https://youtube.com/shorts/_N4iLnZyb-0?si=dfhUg_AVplUZRM4B
https://youtube.com/shorts/paCaptm3uwo?si=CDVHmZ8tWfT1p3Qu
https://youtube.com/shorts/JPqEUvF2RFc?si=gNgdtOUKqXd7cLBb
https://youtube.com/shorts/9kyAXi4RUfc?si=jPwlv4eab3VEovzN
- आरती
संकलन कर्ता संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी।
"दुनिया, समाज सब बहुमत पर ही चलता है पापा, जिसकी ज्यादा सँख्या ज्यादा हो, उसी की तूती बोलती है' नमन पिता से कह रहा था, "अल्पमत को कोई नहीं पूछता।"
"नहीं बेटा" बाहर कम्पाउंड की ओर देखते प्रथमेशजी बोले, "हमेशा ऐसा नहीं होता, एक अकेला प्रखर बुद्धि, तेजस्वी इंसान भी अपने संकल्प को लेकर दृढ़ हो तो अन्याय की भीड़ को हरा सकता है। दीपक को देखा है न। दिये को। दीया, एक अकेला दीपक, जब प्रकाशित होता है कैसे घनघोर अंधेरे के बहुमत को हरा देता है? वो देखो, बाहर।"
उनकी बातें सुन मुस्कुराती, बाहर अंधेरे कम्पाउंड में खड़ीं मालिनी जी ने तभी दीपक जलाया तो उनके चेहरे के साथ ही *उजले वातावरण ने भी दमक कर* प्रथमेश जी की बात का समर्थन कया।
*और उस रात हार गया अंधेरे का बहुमत।*
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
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