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भ्रामक प्रचार जिसका अर्थ है ऐसा प्रचार जो हमें भ्रम में डालता हो हमें सही चीजों से भटकाता हो, माने कि हमें सही चीजे न दिखा कर वो दिखाया जाए जिसके कारण हम उस संस्था की ओर आकर्षित हो सकें ।
विस्तार में समझते हैं:
जब हम कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए जाना चाहते हैं तो वहाँ पर हमको अध्यापको के पढ़ाने के तरीके जैसे- विश्लेषणात्मक व समीक्षात्मक व्याख्या करने का तरीका या उनकी अकादमिक योग्यता और अनुभव जैसे पहलुओं को देखना चाहिए। वहां पर अध्ययनरत छात्र छात्राएं विषय को कितना समझ पा रहे है यह जरूरी है। फिर यह भी आवश्यक है कि हमारे द्वारा यदि कोई प्रश्न पूछा जाता है तो क्या अध्यापक उसका सटीक उत्तर दे पा रहे हैं।
हम जब किसी संस्थान को चुने तो उसका कारण उपरोक्त होना चाहिए लेकिन भ्रामक प्रचार के चलते हम हाई रैंक और चकाचौंध देखने लगते है। इससे ज्यादातर संस्थानों में छात्रों की संख्या अमूमन बढ़ जाती है। जिसकी देखा देखी कभी-कभी समाज का दूसरा व्यवसायिक वर्ग भी भ्रम फैलाने की कोशिश करता है। वहीं दूसरी और छात्र वर्ग भी इस लालसा में कि कल प्रचार में इस फोटो की जगह मेरी फोटो होगी, वो भी इन संस्थानों का रूख करते हैं। और समय नष्ट करते हैं उचित मार्गदर्शन और पठन सामग्री के अभाव में।
इन सब का परिणाम ये होता है कि व्यवसायी वर्ग एक गलत चलन से अपना व्यवसाय आगे बढ़ाते हैं, वही छात्र वर्ग जब सालों मेहनत के बाद वो नहीं पाते, जो वो चाहते थे तो वो अवसाद और कभी-२ अति-अवसाद से घिर जाते है जो कभी-कभी आत्महात्या का
कारण भी बनता है। इसीलिए इन भ्रमों से बचना जरूरी है और कोचिंग चुनने का तरीका विश्लेषणात्मक और समीक्षात्मक हो।
एक और बात जो जुड़ी हुई है ऊपर के मुद्दे से वो है छात्रों की मानसिकता और कसौटी का जिसने कोचिंग संस्थानों को भ्रामक प्रचार का लालच दिया है वो है सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक समझ की कमी और चकाचौंध के आधार पर आंकलन की ग़लत आदत, संस्थान का चुनाव उसकी पठन सामग्री और शिक्षण प्रक्रिया हो न कि उस संस्थान से कितने टापर निकले।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
पिछले कुछ समय से आप एक स्वतंत्र लेखिका के रूप में वेबसाइट को सहयोग स्वरूप पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और विश्लेषणात्मक लेख उपलब्ध करा रही हैं जो आमजन के साथ सरकारी सेवाओं के अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
यथार्थ सवाल करता है, यार प्रेम तुम अपनी वेबसाइट पर इतने आर्टिकल, लघुकथा व अन्य चीजें डालते रहते हो जबकि बहुत से लोग इन विषयों पर पहले ही लिख चुके है फिर तुम इन पर क्यों लिखते हो?
प्रेम गहरी साँस लेकर फिर मुस्कुराते हुए उत्तर देता है, तुम सही कर रहे हो यथार्थ कि इन विषयों पर पहले भी लिखा जा चुका है लेकिन उसकी पहुंच सीमित है क्योंकि एक वक्त जब मुझे ऐसी ही चीजों की जरूरत थी, एक स्पष्टता की जरूरत थी तब मुझे ये सब नहीं मिल पाया, कितना अच्छा होता अगर ये मुझे किसी स्थानीय स्तर पर मिल जाता और आसानी से मिल जाता, उसी कमी को भरने को मैं अपने तरीके से लोगों तक और उन छात्रों तक इसकी सरल पहुँच बनाना चाहता हूँ जिससे कि जिस स्पष्टता की कमी का सामना मैंने किया है उसे दूसरे न महसूस करे। अगर ये चीजें किसी एक के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकी तो मैं इस काम को सार्थक समझूँगा।
यथार्थ गर्व की अनुभूति के साथ कहता है, वाह यार तुमने तो एक आदर्श प्रस्तुत कर दिया, शिकायत ही नहीं काम करके कमी को भरने का प्रयास! प्रेम के हाव भाव से विनम्रता और संतुष्टि का भाव झलक रहा था।
-लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
सान्निध्य कौतूहलवश, यथार्थ तुम इतना टाइप कैसे कर लेते हो?
तुम्हारी उंगलियों में दर्द नहीं होता !
यथार्थ (अपनी टाइपिंग लाइन पूरा करते हुए)- सान्निध्य, पहली बात तो यह काम मेरी रुचि का है, मुझे आर्टिकल, लघुकथा लिखना बहुत पसंद है।
दूसरी बात, मैंने लोगों को अक्सर समाज और सरकार की बुराइयाँ करते हुए सुना है, मैं उन शिकायतों से आगे बढ़कर काम करना चाहता हूँ, इसीलिए मैं बिना खाए भी ये काम निरंतर कुछ समय तक कर सकता हूँ, क्योंकि ये काम मुझे बहुत जरूरी लगता है और इस तरह मैं लोगों में संवेदनशीलता बढ़ाने के निमित्त कुछ प्रयास कर पा रहा हू और उन जरूरी बातों की तरफ ध्यान खींच रहा हूं लोगों का जिधर ध्यान जाना चाहिए।और ये काम इतना जरूरी लगता है कि थकान भी मुझे रोक नहीं पाती।
अब सानिध्य समझ चुका था कि यथार्थ समाज और सरकार के बारे में लोगों की शिकायतों पर इसी तरह खूब काम करके प्रतिक्रिया करता है।
-लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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अक्षिता विस्मित भाव से, चेतना मैं तुम्हारी एक बात से चौंक जाती हूँ कि तुम अपरिचित लोगों से भी इतने खुलेपन के साथ कैसे बात कर लेती हो, तुम्हें डर नहीं लगता कि इससे कोई हानि भी हो सकती है या लोग तुम्हें ग़लत समझ सकते हैं?
चेतना मुस्कुराते हुए देखो अक्षिता, अपना तो सिंपल फंडा है जो वास्तव में हो वही दिखो जब मैं नए लोगों से फ्रैंकनेस से पेश आती हूँ तो सामने से भी मैं ऐसी ही उम्मीद रखती हूँ। इससे हम दोनों मुखौटे के साथ नहीं मिलते, मैं इससे लोगों से सच्चाई से मिलती हूं और जो मुझसे इत्तेफाक रखेंगे वही मिलेंगे, जो मेरे काम के महत्व को समझेंगे, किसी खास मौके पर हम मिले तो हम वही रहेंगे जो पहली बार में थे। हमारी ईमानदारी ही हमारे एसोसिएशन की मजबूत नींव बनेगी। इसीलिए मैं अपरिचित लोगों से ऐसे ही सच्चाई से मिलती हूँ। अगर हम खुद ही मुखौटा लगा लेंगे तो सामने वाले से सच्चा होने की उम्मीद नहीं कर सकते।अगर बाद में कलई खुलने पर कोई साथ छूटना है तो अभी वो जुड़े ही क्यों?
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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रंजना - स्तुति तुम ये क्या लेखन के काम में लगी रहती हो, न जॉब है अभी, न जिंदगी में स्थायित्व (स्तुति की सहेली उलाहना देते हुए कहती है)!
स्तुति- (मुस्कुराते हुए) रंजना, मैं अपनी जॉब के लिए प्रयासरत हूँ, जिसके लिए मैं अपनी पढ़ाई भी करती हूँ। फिर इतना पढ़ने के बाद मूकदर्शक की भाँति सिर्फ शिकायतें करना नहीं पसंद करती। इससे इतर लोगों को स्पष्टता, सार्थकता व निडरता देने के लिए काम करना चाहती हूँ। मैं ऐसा करके ऐसे व्यक्तियों का सहयोग भी कर रही हूँ जो इसी काम में लगे हुए हैं, इस सहयोग के साथ मैं खुद के समय को नियमित सार्थक कार्य में लगा पाती हैं।
रंजना, जो अब तक स्तुति को एक एवरेज इंसान मानकर उलाहना दे रही थी, उसकी बातों सुनकर उस पर गर्व महसूस करके मुस्कुरा रही थी।
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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यार उत्कर्ष, आजकल वेबसाइट पर बहुत आर्टिकल और लघुकथाएँ डाल रहे हो, दूसरे काम बंद कर दिए क्या? आखिर क्या राज है?
अभिनव - अरे उत्कर्ष, कोई है जो मुझे इस काम के लिए प्रोत्साहित करता है, इस काम की महत्ता को स्वीकार करता है और नियमित कुशल क्षेम पूछ इस काम के महत्व को दर्शाता है यहां तक कि ये काम नियमित चल सके उसके लिए सहयोग भी।
प्रोत्साहन से प्रसन्नता बढ़ती है और प्रसन्नता से दक्षता, परिणाम तुम्हारे सामने है और मुस्कुराने लगता है।
उत्कर्ष - अच्छा तो ये तारीफ का कमाल है। (वह आंखों में चमक के साथ बोलता है) सही भी है, हमें प्रोत्साहन मिलता है, तो हम खुश होते हैं और अधिक कुशलता से काम करते हैं।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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यार प्रत्यक्ष - तुम वाट्सऐप चैट में इतना इमोजी क्यों भेजते हो ?
प्रत्यक्ष- मैं तुम्हारे सामने बात करते समय मुस्कुराकर बात कर रहा हूँ, इससे तुमको भी अच्छा लग रहा होगा। क्योंकि मुस्कुराहट से जीवंतता प्रतीत होती है।
सार्थक - हाँ यार, ये तो है।
प्रत्यक्ष - इसी जीवंतता को मैं अपने संदेशों में लाना चाहता हूँ, इससे रिसीवर तक एक खुशी भी पहुँचती है जिससे उसके काम में भी दक्षता आती है।
क्योंकि इमोजी का उपयोग बातचीत में जीवंतता और भावनाएं जोड़ने के लिए किया जाता है। वे शब्दों के बिना विचारों को व्यक्त करने का एक तरीका हैं, और वे एक संदेश को अधिक मनोरंजक और आकर्षक बना सकते हैं। साथ ही वे बातचीत को अधिक व्यक्तिगत और संबंधित बना सकते हैं। वे टोन और भावना व्यक्त करने में मदद कर सकते हैं, जिससे संदेश को समझना आसान हो जाता है। अंत में, वे भावनाओं को व्यक्त करने में मदद कर सकते हैं जो शब्दों में व्यक्त करना में असमर्थ होते हैं।
और अगर तुम्हारे मुस्कुराने से अगर सामने वाले को अच्छा लगे या उसकी एफीसिएंसी बढ़े तो क्या तुम कंजूसी करोगे ?
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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मास्टर डिग्री पूरी होने के बाद दो रूममेट्स एक दूसरे से विदा लेते हुए - कॉलेज का एक नियम था कि एक जूनियर व एक सीनियर एक रूम में रह सकते हैं कोर्स भिन्न हो)
सीनियर मोहित - चलता हूँ प्रेम, तुम्हारा व्यवहार मुझे बहुत अच्छा लगा, टच में रहना।
प्रेम - हाँ, मोहित भैया, हम संपर्क में रहेंगे तभी तो याद रहेगा कि वित्तीय हितों से ऊपर भी कुछ सार्थकता व स्पष्टता देने वाले काम होते हैं। आपने मुझे जो लेखन की आदत डलवाई है, उससे मैं हमेशा लोगों के लिए लिखता रहूँगा, जरूरत पड़ने पर बोलूँगा भी और ये सब आपसे संपर्क के कारण निरंतर चलता रहेगा।
संपर्क जरूरी है इस भले काम के लिए और वे एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा लेते हैं और साथ ही विदाई के समय एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्यार को व्यक्त करते हैं और आगे बढ़ते हैं उत्कृष्टता और उससे मिलने वाले शुकून के लिए।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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गरिमा - आभा एक बात तो बता जरा।
आभा - हाँ गरिमा, पूछो?
गरिमा - संपादक महोदय जब मुझे लेखिका महोदया बुलाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है जबकि नाम से जब वो बुलाते हैं तो इतना अच्छा नहीं लगता, ऐसा क्यों?
आभा - तू जवाब जानती है, फिर भी मुझसे पूछ रही है। लेखिका तो तू है, तुझे पता होना चाहिए और आभा हंसने लगती है।
गरिमा मुस्कुराते हुए- तू ऐसा ही समझ ले, अब बता।
आभा - इस संबोधन में तुम्हारे काम (लेखन) को महत्व दिया जा रहा है, जो तुम्हारा भी महत्व है, हर व्यक्ति खुद को महत्वपूर्ण समझना चाहता है और इसके संबोधन में तो तुम्हारे काम व तुम्हे दोनों को महत्व मिलता है, इसीलिए अच्छा लगता है दूसरे शब्दों में
'लेखिका' शब्द गरिमा तुम्हारे पेशे और पहचान का प्रतीक है। जब संपादक तुम्हे 'लेखिका' कहते हैं, तो वह तुम्हारे काम को मान्यता देते हैं और तुम्हे यह महसूस कराते हैं कि तुम एक पेशेवर हो और तुम सम्मानित महसूस कराती हो।
ठीक है न लेखिका महोदया ? और दोनों हंसने लगती हैं।
© सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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आलोक और विवेक, शाम को टहलते हुए,
आलोक - यार, विवेक बहुत कहानियाँ लिखी जा रही हैं आजकल, सबको ज्ञान दे ही दोगे लग रहा, बाकी सारे काम बंद कर दिए क्या? और आलोक हंसने लगता है।
विवेक मुस्कुराते हुए- हाँ, आलोक प्रयास तो ऐसा ही है, तुम तो आलोक कहीं डाल नहीं रहे हो, इसीलिए मैं ही ऐसा करने का प्रयास कर रहा हूं। (दोनों हंसने लगते है)
आलोक - अच्छा एक बात बताओ एक दिन में कितनी कहानियाँ लिख सकते हो?
विवेक - (मुस्कुराते हुए) लिखने को तो बहुत सी लिख दूँ, जिन मुद्दों पर लिखना है उनके नाम जेहन में हैं फिर भी अन्य काम भी है और जीविका भी तो चलानी है।
बात को आगे बढ़ाते हुए संयत होकर विवेक कहता है कि लिखने को तो एक दिन में 15 कहानी लिख दूँ अगर इस काम की महत्ता को दर्शाना हो। लेकिन अच्छा प्रदर्शन भी जरूरी है। पर कुछ मोटी बुद्धि के लोग सिर्फ संख्या देखकर ही महत्व समझते है,
©लवकुश कुमार
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