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पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026

बीते रविवार (05-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से पाँचवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, 

जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों/विचारों पर सार्थक चर्चा हुयी:

·हिमांक और क्वथनांक के बीच - शेखर पाठकनवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद

·A Doctor's Experiments in Bihar - डॉ. तारू जिंदल, Speaking tiger Books

·अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) – महेश चन्द्र पुनेठा, समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून  

·परीक्षा कक्ष के बाहर पड़े मोजे जूते (कविता)- महेश चन्द्र पुनेठा

·आपका बंटी – मनु भण्डारी (लघु उपन्यास)

·उमराव जान अदा- मिर्ज़ा हदी रुसवा (उपन्यास)

·अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई

·पुस्तक हिमांक और क्वथनांक के बीच के संबंध में आदरणीय पुनेठा सर के शब्दों में – “इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।”

·A Doctor's Experiments in Bihar, डॉ. तारू जिंदल (मुंबई की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ) द्वारा लिखी गई एक प्रेरक पुस्तक है, जो बिहार के मोतीहारी के जिला अस्पताल और पटना के पास मसरही गाँव में उनके 2 साल के चुनौतीपूर्ण कार्यकाल का वर्णन करती है यह पुस्तक बिहार की वास्तविक सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति और एक समर्पित डॉक्टर के संघर्ष की कहानी बताती है, वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सिद्धेश्वर सिंह सर ने इस किताब को पढ़ने का सुझाव दिया न केवल चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों को बल्कि अन्य को भी इसे पढ्ना, समझ को विस्तार देने वाला बताया, सर ने आगे कुछ अन्य बातों पर भी ज़ोर दिया वस्तुतः

  • ·क्या क्या पढ़ें और क्या अवॉइड करें
  • ·पुस्तक परिचर्चा में पुस्तकों तक सीमित रहें
  • ·उन्होने बताया कि एक पुस्तक पढ़ने और फोन पर किताब पढ़ने में अंतर को उजागर किया, माने भौतिक पुस्तक का एक साथी की तरह आपके सामने रहना
  • ·पुस्तकें केवल आपके क्षेत्र की ही नहीं, बाहर की पुस्तकें भी पढ़ें ताकि सोच और नजरिए को विस्तार मिले
  • ·शिक्षाविद और चिंतकआदरणीय पुनेठा सर ने पढ़ने की संस्कृति पर निम्नलिखित जरूरी बातें कहीं :
  • · सर ने आरंभ स्टडी सर्कल की बात की, जिसका पढ्ने के संस्कृति को बढ़ाने के लिए उल्लेखनीय योगदान रहा
  • ·आपने इस बात पर ज़ोर दिया कि किताबें पढ़ना हमारी दिनचर्या मे वैसे ही शामिल हो जैसे अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियां
  • ·सर ने इस बात पर ध्यान खींचा कि पढ़ने, सोचने विचारने वाला समाज शांति का समर्थक होता है |
  • ·पुस्तकें हमे आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने मे मदद करती हैं और हम कुछ भी यूंही नहीं मानते, फिर हम सवाल करते हैं
  • ·किताबें हमे बुराइयों से लड़ने मे सक्षम बनाती हैं
  • ·लोकतान्त्रिक समाज की स्थापना और स्थायित्व के लिए पुस्तकें पढ़ना और जरूरी है  
  • ·पुस्तक परिचर्चा यदि भौतिक रूप से आयोजित कि जाये तो परिचर्चा मे शामिल पाठक अपने साथ लायी पुस्तकों की अद्ला बदली भी कर सकते हैं
  • ·सर ने उत्तराखंड की एनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले शेखर पाठक सर जैसी शख्सियत की रचना के बारे मे बात की
  1. ·चर्चा में जुड़े शिक्षक शिवम राय जी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पढ़ना केवल रोजगार प्राप्ति तक सीमित न हो, समाज मे बढ़ रहा नैतिक पतन, हमरी पुस्तकों से दूरी के चलते भी है, क्योंकि हम बुराइयों से लड़ने मे उतने दृढ़ नहीं
  2. ·अब पहुंची हो तुम, एक संवेदना से भरने वाला कविता संग्रह है जो न केवल समाज और मानव मन की दिक्कतों की तरफ ध्यान खीचता है वरन उनके हल भी सुझाता है|
  3. ·मनु भण्डारी कृत आपका बंटी में लेखिका ने शब्दों के चयन पर रचनात्मकता दिखाई है उस पर बैंक ऑफ बड़ौदा मे राजभाषा अधिकारी शिल्पी मैम ने पुस्तकों का ध्यान खींचा की किस तरह यह उपन्यास एक बालमन को प्रभावित करने वाले उसके माता पिता के व्यवहार और जीवन पर केन्द्रित है |
  4. ·उमराव जान अदा पर बात करते हुये निशांत शुक्ल जी गजल के शब्द भंडार हेतु पढ़ने पर ज़ोर देते हैं |
  5. ·पुस्तक परिचर्चा के अंत मे प्रदीप छाजेड़ भैया ने सरस्वती माँ की एक प्रार्थना के माध्यम से इस बात पर ज़ोर दिया कि पढ़ने का उद्देश्य समझ को विस्तार देना हो नकि अहंकार को पुष्ट करना, साथ ही लवकुश कुमार की पुस्तक “अंतस - जरा ठहरिए” आपने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमे थोड़ा ठहरकर अपने अंतस को संबोधित करना बहुत जरूरी है एक शांत और उत्कृष्ट जीवन के लिए |

·धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी मौजूद रहे:

महेश चन्द्र पुनेठा सर, सिद्धेश्वर सिंह सर,अर्चना बेंज्वाल मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, शिल्पी मैम,शिवम राय, सौम्या मैम, सोनम मैम, प्रिया, अरविंद जी, आरती जी, अंशुल पांडे, निशांत शुक्ल जी, गायत्री,अंजना जी, कृष्णकांत जी,उर्मिला,शोभित, दिव्याशु एवं लवकुश|

 

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

लिंक - हिमांक से क्वथनांक तक - पुस्तक समीक्षा

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार