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इरफ़ान : और कुछ पन्ने कोरे रह गए
वरिष्ठ पत्रकार , फ़िल्म आलोचक, समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज के द्वारा लिखी गई यह किताब लेखक और अभिनेता इरफान के बीच एक प्रोफेशनल और आत्मीय संवाद संस्मरण है जो इरफ़ान को सिर्फ़ एक सुपरस्टार ही नहीं बल्कि एक संवेदनशील, गहरा सोच रखने वाले इंसान के रूप में पेश करती है। किताब इरफान को दो तरह से जानने का अवसर देती है । एक, बड़े अभिनेता के रूप में और दूसरे, बड़ी शख्सियत के रूप में ।
किताब इरफान और इरफ़ानियत दो खण्डों में विभाजित है । पहले खण्ड में लेखक द्वारा इरफान के अलग अलग समयों पर लिए गए साक्षात्कार, उनके फिल्मों पर चर्चा, निजी अनुभव आदि शामिल हैं और दूसरे खण्ड में प्रसिद्ध लेखकों, पत्रकारों , अभिनेताओं के साथ इरफान से जुड़े संस्मरण दर्ज हैं ।
किताब के जरिये इरफान तीन तरह से पाठकों को अप्रोच करते हैं -
व्यक्तिगत इरफान, जो सीधे संवाद के जरिये अपने बचपन , परिवेश , शहर और उनसे जुड़े जीवन के घुमावदार अनुभवों को साझा करते हैं। वे कई फिल्मों का जिक्र करते हैं जहां बताते हैं कि किस तरह चरित्र को उन्होंने अपने अनुभवों से जोड़कर दिखाया है। पाठक उनकी अभिनय प्रक्रिया की गहराई से परिचित होते हैं । यह हिस्सा बताता है कि वे फ़िल्म नहीं चरित्रों की दुनिया बनाना चाहते थे।
पेशेवर इरफान जो अपने पेशे की बारीकियों को भी दर्ज कर रहे हैं । उद्योग-पूँजी सम्बन्धों की भी आलोचना भी कर रहे हैं जब वो कहते हैं कि यहां टैलेंट से नहीं नेटवर्किंग से काम मिलता है । बुरे प्रसंगों को भी दर्ज कर रहे हैं जब प्रोड्यूसर बुरी एक्टिंग का बहाना बनाकर पूरे पैसे नहीं दे रहा है। फ़िल्म जगत की तस्वीर को ग्लैमर और चकाचोंध से आगे जाकर शोषण व्यवस्था और निर्भरता के स्याह हिस्से को भी दर्ज करना नहीं भूलते।
दार्शनिक इरफान जो पाठकों को अभिनेता के पीछे छिपे एक शख्सियत इरफान को जानने का अवसर देता है। जो बताता है कि कोई किरदार निभाते हुए जब आपके व्यक्तित्व में कुछ जुड़ जाए, या कुछ हल्का सा क्षरण हो जाये वही असली इनाम या रिटर्न है, पैसा तो बाइप्रोडक्ट है। यह दृष्टि उन्हें सांस्कृतिक आलोचक के रूप में भी खड़ा करती है और कहीं न कहीं पाठकों की चेतना को भी घेरती है । यही दृष्टि परदे पर दर्शकों के भीतर सवाल भी पैदा करती है। इस हिस्से में उनकी फ़िल्मों और स्टारडम से जुड़ी गहरी टिप्पणियों के साथ साथ उनके धार्मिक‑सामाजिक राजनैतिक विचार और दर्द‑संवेदना के स्वर भी सामने आते हैं।
अचानक 2018 में उन्हें न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (Neuroendocrine Tumour) नाम का एक दुर्लभ कैंसर होने का पता चलता है । इरफान इलाज के लिए लंदन जाते हैं । कुछ वक्त बाद लंदन से उनका एक पत्र आता है जिसे सोशल मीडिया पर , उनके तमाम फैन्स साझा करते हैं। उनके लिए दुआएं करते हैं ।
यह भावभीना पत्र इरफ़ान ने लंदन के एक अस्पताल की बालकनी से अपने मानसिक और शारीरिक दर्द के बीच वहां की परिस्थितियों, दर्द, शुक्रिया और उम्मीद की भावना को शांत लफ़्ज़ों में पिरोकर लिखा है, जब वे इस दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे थे । किताब में दर्ज इस पत्र को पढ़कर पाठक भावुक हुए बिना न रह सकेंगे । आत्म‑संवादात्मक शैली में लिखे गए इस पत्र में वह न सिर्फ़ अपनी बीमारी बता रहे हैं, बल्कि ज़िंदगी के “मोड़”, अनिश्चितता , दर्द और जीवन के दार्शनिक पक्ष को भी छू रहे हैं। इरफ़ान के लिए ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है, बल्कि एक अनियोजित, अनिश्चित सफ़र है, जिसका अंत उनकी मर्ज़ी से नहीं होता। इरफान मनुष्य की सीमाओं और जीवन की अनिश्चितता के बीच संघर्ष अपने संदेश में प्रकट करते है।
इरफ़ान लिखते हैं कि वह एक “तेज़ ट्रेन‑सफ़र” पर थे- अपनी योजनाओं, आकांक्षाओं, फ़िल्मों, सफ़लता के बीच- जब अचानक किसी ने कहा : “आपका गंतव्य आ गया, अगले स्टॉप पर उतरना है।”
लंदन प्रवास के दिनों में जब लेखक इरफान के संघर्ष के दिनों की एक पुरानी तस्वीर भेजते हैं तो इरफान कहते हैं -
“यह मेरा मुम्बई का पहला 10 बाई 10 का कमरा है और आज फिर मैं वापस 10 बाई 10 के कमरे में पहुंच गया हूँ। इंटरेस्टिंग बात यह है कि तब मैं अपने रहने की जगह बड़ी से बड़ी करने के सफर में था और आज मैं चाहूंगा कि यह जितना छोटा और सिंपल हो सके उतना मैं खुश हूँ।”
और इस तरह दो साल तक बीमारी से लड़ते लड़ते इरफान अपने फैन्स को निराश करते हुए 2020 में अलविदा कह गए और जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने कोरे रह गए !
अर्चना बेन्ज्वाल मैम की फेसबुक वाल से साभार