प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।
मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है
कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं,
वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं
वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं
अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं
बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं
क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है?
तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं
समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता
वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री
जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार
पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री
जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके
जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे
जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल
पुरुषों के लिए
चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए
चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो
पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|
-सौम्या
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:
इस कविता में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?
इस कविता में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।
इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?
इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।
कवयित्री महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?
कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।
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